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सूर्यदेव की सात और मां दुर्गा की एक परिक्रमा करनी चाहिए, इस दौरान कौन सा मंत्र बोलें?

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पूजा-पाठ करते समय में भगवान की प्रदक्षिणा यानी परिक्रमा करने का विधान है। ये एक अनिवार्य परंपरा है, इसका पालन आज भी पूजा-पाठ में किया जाता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार शास्त्रों की मान्यता है कि परिक्रमा से पापों का नाश होता है। विज्ञान की नजर से देखें तो शारीरिक ऊर्जा के विकास में मंदिर परिक्रमा का विशेष महत्व है। भगवान की मूर्ति और मंदिर की परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ की ओर से शुरू करनी चाहिए, क्योंकि प्रतिमाओं में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर इस सकारात्मक ऊर्जा से हमारे शरीर का टकराव होता है, इस वजह से परिक्रमा का लाभ नहीं मिल पाता है। दाहिने का अर्थ दक्षिण भी होता है, इस कारण से परिक्रमा को प्रदक्षिणा भी कहा जाता है। जानिए परिक्रमा से जुड़ी खास बातें…

परिक्रमा से जुड़ी खास बातें

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  1. परिक्रमा की संख्या

    सूर्य देव की सात, श्रीगणेश की चार, भगवान विष्णु और उनके सभी अवतारों की चार, देवी दुर्गा की एक, हनुमानजी की तीन, शिवजी की आधी प्रदक्षिणा करने का नियम है। शिवजी की आधी प्रदक्षिणा ही की जाती है, इस संबंध में मान्यता है कि जलधारी को लांघना नहीं चाहिए। जलधारी तक पंहुचकर परिक्रमा को पूर्ण मान लिया जाता है।

  2. परिक्रमा करते समय इस मंत्र का करें जाप

    यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
    तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।

    इस मंत्र का अर्थ यह है कि जाने-अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाए। परमेश्वर मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें।

  3. ये है भी परिक्रमा करने का एक तरीका

    परिक्रमा किसी भी देवमूर्ति या मंदिर में चारों ओर घूमकर की जाती है। कुछ मंदिरों में मूर्ति की पीठ और दीवार के बीच परिक्रमा के लिए जगह नहीं होती है, ऐसी स्थिति में मूर्ति के सामने ही गोल घूमकर प्रदक्षिणा की जा सकती है।

     

Input : Dainik Bhaskar

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शारदीय नवरात्रि में जपें दुर्गा सप्तशती के ये प्रभावशाली मंत्र, मिलेगा धन, सौभाग्य और सफलता

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शारदीय नवरात्रि मां दुर्गा की पूजा करने और उनके मंत्रों के जाप से अपने कार्यों की सिद्धि करने का उत्तम अवसर है. इन नौ दिनों में आप मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करके अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं. इसके लिए आपको दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का जाप करना चाहिए. दुर्गा सप्तशती में कई ऐसे प्रभावशाली सिद्ध मंत्र दिए गए हैं, जिनके जाप से आप उत्तम सेहत, धन, सौभाग्य, सुरक्षा, सफलता आदि की प्राप्ति कर सकते हैं.

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काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट बताते हैं कि दुर्गा सप्तशती के कई मंत्रों का जाप यदि शुद्धता के साथ करें और नियमों का पालन करें तो आपको अवश्य ही मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होगा. जिस पर मां दुर्गा की कृपा हो जाती है, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव जैसा नहीं रह जाता है क्योंकि मां दुर्गा आदिशक्ति हैं. आइए जानते हैं दुर्गा सप्तशती के उन चमत्कारी मंत्रों के बारे में, जो विशेष कार्यों के लिए ही सिद्ध किए जाते हैं.

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दुर्गा सप्तशती के प्रभावशाली और चमत्कारी मंत्र

1. संकट और विपत्ति नाश करने वाला मंत्र
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।

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2. जीवन में सभी प्रकार के कल्याण का मंत्र
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तु ते।।

3. असाध्य रोगों के नाश के लिए मंत्र
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।

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4. उत्तम सेहत और सौभाग्य के लिए मंत्र
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

5. मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त करने के लिए मंत्र
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः।।

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6. प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए मंत्र
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव।।

7. शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए मंत्र
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोस्तु ते।।

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8. मां दुर्गा से रक्षा पाने के लिए मंत्र
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नरू पाहि चापज्यानिरूस्वनेन च।।

मां दुर्गा के अन्य प्रभावशाली मंत्र

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9. दरिद्रता दूर करने के लिए मंत्र
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो।
सवर्स्धः स्मृता मतिमतीव शुभाम् ददासि।।

10. धन और संतान प्राप्ति के लिए मंत्र
सर्वाबाधा वि निर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥

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11. सुख, सौभाग्य, सेहत के लिए मंत्र
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै।।

Source : News18

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शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन करें मां शैलपुत्री की आरती, प्रसन्न होंगी माता रानी

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कल से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रही है। नवरात्रि में 9 दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि शुरू होकर 5 अक्तूबर को दशहरा पर समाप्त होगी। शारदीय नवरात्रि का खास महत्व होता है। नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना की जाती है। इस बार शारदीय नवरात्रि पूरे 9 दिनों की रहेगी और माता दुर्गा स्वर्गलोक से गज की सवारी करते हुए पूरे नौ दिनों तक अपने भक्तों के बीच रह कर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करेंगी। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री हिमालयराज की पुत्री हैं। मान्यता है कि प्रथम दिन शैलपुत्री की आराधना इसीलिए की जाती है ताकि जीवन में उनके नाम शैल(पहाड़) की तरह स्थिरता बनी रहे। धार्मिक मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने से वो अपने भक्तों पर प्रसन्न होती हैं। इसके साथ ही उनकी सारी मनोकामनाएं भी पूरी करती हैं। मां शैलपुत्री की पूजा बिना आरती के अधूरी है। आइए पढ़ते हैं माँ शैलपुत्री की सम्पूर्ण आरती यहां।

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मां शैलपुत्री आरती

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शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

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सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

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जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

शैलपुत्री पूजा मंत्र

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नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा करते समय नीचे दिए गए बीज मंत्रों का जाप अवश्य करें।

या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता

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नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

शिवरूपा वृष वहिनी हिमकन्या शुभंगिनी

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पद्म त्रिशूल हस्त धारिणी

रत्नयुक्त कल्याणकारिणी

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ओम् ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:

बीज मंत्र- ह्रीं शिवायै नम:

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वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्

वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्

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साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए खुलता है नागचंद्रेश्वर मंदिर, नेपाल से आई ये प्रतिमा बेहद खास

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सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है. तिथि के मुताबिक इस बार नाग पंचमी 2 अगस्त को पड़ रही है. नाग पंचमी के दिन स्त्रियां नाग देवता की पूजा करती हैं और सांपों को दूध पिलाया जाता है. सनातन धर्म में सर्प को पूज्यनीय माना गया है. नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है और उन्हें गाय के दूध से स्नान कराया जाता है. माना जाता है कि जो लोग नाग पंचमी के दिन नाग देवता के साथ ही भगवान शिव की पूजा और रुद्राभिषेक करते हैं, उनके जीवन से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है. साथ ही राहु और केतु की अशुभता भी दूर होती है.

साल में सिर्फ नाग पंचमी के दिन खुलते हैं इस मंदिर के कपाट, भक्त करते हैं  11वीं शताब्दी की अद्भुत प्रतिमा के दर्शन Nag Chandreshwar temple situated  is opened only in the

महाकाल की नगरी उज्जैन को मंदिरों का शहर कहा जाता है. इस शहर की हर गली में एक ना एक मंदिर जरूर है. उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के तीसरे भाग में नागचंद्रेश्वर मंदिर है. नागचंद्रेश्वर मंदिर का अपना अलग महत्व है. इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के दिन 24 घंटे के लिए ही खुलते हैं. नागचंद्रेश्वर मंदिर की क्या खास बात है यह भी जान लेते हैं

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UJJAIN : दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर जो साल में सिर्फ नागपंचमी के दिन ही  खुलता है, यहां सर्प शैय्या पर विराजमान हैं महादेव.

नेपाल से लाई गई थी प्रतिमा

भगवान नागचंद्रेश्वर की मूर्ति काफी पुरानी है और इसे नेपाल से लाया गया था. नागचंद्रेश्वर मंदिर में जो अद्भुत प्रतिमा विराजमान है उसके बारे में कहा जाता है कि वह 11वीं शताब्दी की है. इस प्रतिमा में शिव-पार्वती अपने पूरे परिवार के साथ आसन पर बैठे हुए हैं और उनके ऊपर सांप फल फैलाकर बैठा हुआ है. बताया जाता है कि इस प्रतिमा को नेपाल से लाया गया था. उज्जैन के अलावा कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है. यह दुनिया भर का एकमात्र मंदिर है जिसमें भगवान शिव अपने परिवार के साथ सांपों की शय्या पर विराजमान हैं.

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त्रिकाल पूजा की है परंपरा

मान्याताओं के मुताबिक, भगवान नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा की परंपरा है. त्रिकाल पूजा का मतलब तीन अलग-अलग समय पर पूजा. पहली पूजा मध्यरात्रि में महानिर्वाणी होती है, दूसरी पूजा नागपंचमी के दिन दोपहर में शासन द्वारा की जाती है और तीसरी पूजा नागपंचमी की शाम को भगवान महाकाल की पूजा के बाद मंदिर समिति करती है. इसके बाद रात 12 बजे वापिस से एक साल के लिए बंद हो जाएंगे.

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पौराणिक कथा

मान्यताओं के मुताबिक, सांपों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए तपस्या की थी जिससे भोलेनाथ प्रसन्न हुए और सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया. वरदान के बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया. लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही इच्छा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो.इसलिए यही प्रथा चलती आ रही है कि सिर्फ नागपंचमी के दिन ही उनके दर्शन होते हैं. बाकी समय परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है. दर्शन को उपलब्ध होते हैं. शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है.

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नाग पंचमी शुभ मुहूर्त 

नाग पञ्चमी मंगलवार, अगस्त 2, 2022 को

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पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 02, 2022 को सुबह 05 बजकर 13 मिनट से शुरू

पञ्चमी तिथि समाप्त – अगस्त 03, 2022 को सुबह 05 बजकर 41 मिनट पर खत्म

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नाग पञ्चमी पूजा मूहूर्त – सुबह 06 बजकर 05 मिनट से 08 बजकर 41 मिनट तक

अवधि- 02 घण्टे 36 मिनट्स

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नाग पंचमी की पूजा-विधि 

नाग पंचमी के दिन अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट, शंख, कालिया और पिंगल नामक देव नागों की पूजा की जाती है. पूजा में हल्दी, रोली, चावल और फूल चढ़ाकर नागदेवता की पूजा करें. कच्चे दूध में घी और चीनी मिलाकर नाग देवता को अर्पित करें. इसके बाद नाग देवता की आरती उतारें और मन में नाग देवता का ध्यान करें. अंत में नाग पंचमी की कथा अवश्य सुनें.

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Source : Aaj Tak

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