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विदेशी पूंजी के लिए छटपटा रहा पाकिस्तान, निवेशकों के आगे करवाया बैली डांस

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इकोनॉमी के मोर्चे पर फाकाकशी की नौबत झेल रहा पाकिस्तान विदेशी निवेश लाने के लिए बेसब्र हो गया है. देश में विदेशी पूंजी लाने के लिए पाकिस्तान बेगैरत हरकतें कर रहा है. इसकी बानगी पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे अजरबैजान देश में देखने को मिली, जहां पर विदेशी निवेशकों के सम्मेलन में निवेशकों को लुभाने के लिए पाकिस्तान ने बैली डांसर्स का प्रोग्राम रखा.

पाकिस्तान की सरहद चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (SCCI) पेशावर ने अजरबैजान की राजधानी बाकू में निवेश कॉन्फ्रेंस आयोजित किया था. इस सम्मेलन का मकसद पाकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनखवा में विदेशी को निवेश लाना था. कार्यक्रम में पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनखवा में मौजूद निवेश की संभावनाओं की जानकारी तो दी ही, लेकिन कार्यक्रम में मौजूद लोगों को हैरानी तब हुई जब उनके मनोरंजन के लिए बैली डांसर्स स्टेज पर आईं.

बैली डांसर्स का ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में दो से तीन बैली डांसर्स स्टेज पर परपॉर्मेंस देते नजर आ रही हैं. सोशल मीडिया पर इस वीडियो के आने के बाद पाकिस्तान सरकार की जबर्दस्त आलोचना हो रही है. ट्विटर पर लोगों ने बरसते हुए पूछा है कि क्या यही नया पाकिस्तान है. एक यूजर ने लिखा है कि भारत चांद पर अपने यान भेज रहा है और पाकिस्तान निवेशकों को लुभाने के लिए बैली डांसर्स को बुला रहा है.

बता दें कि पाकिस्तान की माली हालत इन दिनों बेहद खराब है. पाकिस्तान अपनी आर्थिक हालत सुधारने के लिए अपने सहयोगी देशों से लगातार मदद मांग रहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान मदद के लिए चीन, अमेरिका, यूएएई के पास जा रहे हैं. पाकिस्तान की सरकार वर्ल्ड बैंक और IMF के सामने भी हाथ फैला चुकी है. IMF ने अगले तीन सालों में पाकिस्तान को 6 बिलियन डॉलर कर्ज देने की घोषणा की है.

Input : Ajj Tak

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कोरोना की पहली वैक्सीन बनाने का दावा, ह्यूमन ट्रायल में रही सफल

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कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच दुनियाभर के देशों के एक्सपर्ट टीके की तलाश में है. इसी बीच Moderna Inc. ने दावा किया है कि उसका पहला ट्रायल सफल हुआ है. इसकी वैक्सीन के जरिए शरीर में एंटीबॉडीज बन रही हैं, जो वायरस के हमले को काफी कमजोर बना देती हैं. हालांकि ये पहला ट्रायल होने के कारण छोटे ग्रुप पर किया गया है लेकिन तब भी डर के इस माहौल में ये पहली बड़ी खबर मानी जा रही है.

कैसे हो रहा है ट्रायल

वैक्सीन का ट्रायल अलग-अलग स्टेज में हो रहा है. इसके तहत देखा जा रहा है कि दवा का शरीर पर कैसा असर होता है और इसमें कितना वक्त लगता है. साथ ही साइड इफैक्ट पर भी ध्यान दिया जा रहा है. सिएटल में 45 स्वस्थ लोगों पर हुए परीक्षण के दौरान उन्हें वैक्सीन के दो कम मात्रा वाले शॉट्स दिए गए. इस दौरान उनके शरीर में कोरोना से लड़ने वाली एंटीबॉडीज दिखाई दीं. ये नतीजे पहले अप्रूव हो चुके किसी टिपिकल वैक्सीन की तरह ही दिख रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इस बारे में कंपनी के CEO स्टीफन बेंसल ने बताया कि एंटीबॉडी का बनना एक अच्छा लक्षण है जो वायरस को बढ़ने से रोक सकता है. बता दें कि मॉडर्ना जनवरी से ही इस वैक्सीन पर काम कर रही है, जबसे चीन के विशेषज्ञों ने कोरोना वायरस का जीनोम सीक्वेंस अलग किया था.

जनवरी में चीन के विशेषज्ञों ने कोरोना वायरस का जीनोम सीक्वेंस अलग किया था

क्या दिखे साइड इफैक्ट

किसी भी वैक्सीन की तरह इसके भी मामूली दुष्परिणाम फिलहाल दिखे हैं. जैसे एक व्यक्ति जिसे वैक्सीन का बड़ा डोज दिया गया था, उसमें बुखार, मांसपेशियों में तेज दर्द जैसे लक्षण दिखे. वहीं एक व्यक्ति, जिसे मिडिल डोज मिला था, उसके शरीर में जहां इंजेक्शन लगा था, उसके आसपास की त्वचा लाल हो गई. इसके अलावा ज्यादातर में बुखार, उल्टियां, मसल पेन, सिरदर्द जैसे साइड इफैक्ट दिखे. ये सारे ही लक्षण लगभग एक दिन में ठीक हो गए.

कब होगा दूसरे चरण का ट्रायल

माना जा रहा है कि ये जुलाई के आसपास होगा, हालांकि कंपनी का कहना है कि वे इसे जल्दी से जल्दी करने की कोशिश करेंगे. ये 600 लोगों पर होगा. इसमें वैक्सीन की अलग-अलग डोज देकर देखा जाएगा कि कम से कम साइड इफैक्ट के साथ वैक्सीन की कितनी मात्रा तय की जानी चाहिए. वैसे आमतौर पर पहले चरण के ट्रायल के बारे में इतनी चर्चा नहीं की जाती है लेकिन चूंकि कोरोना से पूरी दुनिया प्रभावित है और किसी सकारात्मक खबर के इंतजार में है, इसलिए मॉडर्ना ने फर्स्ट ट्रायल के बारे में भी विस्तार में बताया

ट्रायल के तहत देखा जा रहा है कि दवा का शरीर पर कैसा असर होता है और इसमें कितना वक्त लगता है

कैसे काम करती है वैक्सीन

इसके तहत वायरस या उसके प्रोटीन का असक्रिय हिस्सा लिया जाता है और जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए उसे वैक्सीन फॉर्म में लाया जाता है. जब ये शरीर में इंजेक्ट किया जाता है तो शरीर में प्रतिक्रिया स्वरूप एंटीबॉडीज बनने लगती हैं. ये ठीक वैसा ही है, जैसे एक बार बीमार हो चुके व्यक्ति के शरीर में उस बीमारी के लिए एंटीबॉडी बन जाती है. मॉडर्ना इसके लिए RNA तकनीक का इस्तेमाल कर रही है. इस वैक्सीन के भीतर जाते ही RNA शरीर की कोशिकाओं को एंटीबॉडी बनाने का निर्देश देते हैं. वैसे दूसरी बीमारियों के लिए पहले अप्रूव हो चुकी वैक्सीन की तुलना में RNA तकनीक नई है लेकिन जल्द से जल्द बीमारी का इलाज खोजने के लिए ये तरीका निकाला गया.

क्या है क्लिनिकल ट्रायल

ये एक तरह की मेडिकल रिसर्च होती है, जिसमें दवा या वैक्सीन की जांच लोगों पर होती है. किसी खास बीमारी की पहचान, इलाज या उसकी रोकथाम के लिए ये जांच होती है, जो ये समझने में मदद करती हैं कि दवा या टीका सेफ भी है और असरदार भी. दवाओं और टीके के अलावा मौजूदा दवाओं में किसी नई खोज, किसी नए चिकित्सा उपकरण का भी क्लिनिकल ट्रायल हो सकता है.

किसी भी वैक्सीन की तरह इसके भी मामूली दुष्परिणाम फिलहाल दिखाई दिए हैं

ट्रायल 3 चरणों में होता है

फिलहाल मॉडर्ना का ये दूसरा चरण होगा. इसका मकसद इस बात की जांच करना है कि दवा या वैक्सीन की ज्यादा खुराक या कितनी ज्यादा खुराक ली जाए, जिसका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट न हो. इस दौरान बहुत बारीकी से देखा जाता है कि शरीर दवा पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं. ये भी हो सकता है कि प्री रिसर्च और फेज जीरो में जो परिणाम दिखे हों, इस स्टेप के नतीजे उससे एकदम अलग हों. असर खराब होने पर ट्रायल रोकना होता है. यही वो फेज है, जिसमें ये तय होता है कि दवा को कैसे दिया जाए, जिससे वो ज्यादा असर करे यानी सीरप के रूप में, कैप्सूल की तरह या फिर नसों के जरिए.

कौन शामिल हो सकते हैं ट्रायल में 

कई वजहों से लोग क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा बनते हैं. जैसे कुछ लोग अपनी बीमारी से हार चुके होते हैं और सोचते हैं कि नई दवा से कुछ तो होगा. कुछ लोग इस वजह से जुड़ते हैं क्योंकि उनकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है. ट्रायल का हिस्सा बनें, इससे पहले वैज्ञानिक उन्हें उनकी बीमारी और उसके मौजूदा यानी वर्तमान में चल रहे इलाज के बारे में बताते हैं. साथ ही नए परीक्षण की पूरी जानकारी दी जाती है कि इसमें क्या होगा और उनके शरीर पर कैसा असर हो सकता है. ये बातें प्री-रिसर्च में सामने आई बातें ही होती हैं. क्लिनिकल रिसर्च में स्वस्थ लोग भी जुड़ते हैं जो किसी बीमारी से बचाव में दुनिया की मदद करना चाहते हैं या फिर जो अपने किसी परिजन की बीमारी ठीक करने की इच्छा रखते हों. सिर्फ आपकी हां ही काफी नहीं, ट्रायल के लिए आपके हेल्थ की जांच भी होती है. सब ठीक होने पर सहमति पत्र साइन किया जाता है और फिर ट्रायल की शुरुआत होती है. इसमें लगातार आपकी निगरानी होती है.

Input : News18

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कोरोना के मुआवजे के तौर पर 15 हजार करोड़ देगा चीन, शी जिनपिंग ने किया ऐलान

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बीजिंग: चीन (China) के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने कोरोना वायरस (Coronavirus) से लड़ने के लिए दुनियाभर के देशों को 2 बिलियन डॉलर की रकम यानी करीब 15 हजार 166 करोड़ रुपए की रकम देने का ऐलान किया है. सोमवार को उन्होंने कहा कि ये रकम दो वर्षों के दौरान दी जाएगी. चीन 2 बिलियन डॉलर की रकम कोरोना की महामारी से जूझ रहे देशों को देगा.

More remains to be done after landmark visit by Xi Jinping to ...

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले चीन ने इसकी घोषणा वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की एक मीटिंग की ओपनिंग सेरेमनी के दौरान की. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मीटिंग को संबोधित किया. पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का संक्रमण चीन से ही फैला है.

विकासशील देशों को दी जाएगी ये रकम

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि चीन 2 बिलियन डॉलर की रकम दो वर्षों के दौरान कोरोना की महामारी से जूझ रहे देशों को देगा. ये मदद कोरोना से आर्थिक और सामाजिक तौर पर प्रभावित विकासशील देशों को दी जाएगी.

शी जिनपिंग ने ये भी कहा कि अगर कोरोना की वैक्सीन बन जाती है तो पूरी दुनिया की जनता का ख्याल रखने के लिए सभी को उपलब्ध करवाई जाएगी. चीन में कुछ बड़ी कंपनियां कोरोना वायरस के वैक्सीन की खोज में लगी हुई हैं.

सोमवार को वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की 73वीं मीटिंग हुई. ये विश्व स्वासथ्य संगठन के फैसले लेने वाली बॉडी है. 194 सदस्य देशों वाले इस संगठन में विभिन्न देशों की लीडरशिप ने संगठन के नेतृत्व, प्राथमिकताओं और उसके बजट को लेकर संतुष्टि जाहिर की.

कोरोना वायरस के स्रोत की जांच को लेकर उठ रही मांग

इस साल कोरोना वायरस की वजह से ये मीटिंग सिर्फ दो दिन के लिए रखी गई है. मीटिंग में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विभिन्न देशों के लीडरशिप अपने विचार रख रहे हैं.

आधिकारिक तौर पर कोरोना वायरस का संक्रमण चीन से फैला है. अभी तक पूरी दुनिया कोरोना के संक्रमण से जूझ रही है. पूरी दुनिया के सामने हेल्थ के साथ आर्थिक संकट खड़ा हो गया है. पूरी दुनिया में कोरोना के चलते करीब 3 लाख 15 हजार लोग मारे गए हैं.

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मीटिंग में यूरोपियन यूनियन और ऑस्ट्रेलिया के साथ करीब 116 देशों ने वायरस के स्रोत का पता लगाने के लिए जांच की मांग की है. अगर 194 देशों में से हो तिहाई देश इस मांग के पक्ष में रहते हैं तो मंगलवार को इस का प्रस्ताव सामने रखा जा सकता है.

हालांकि चीन ने कोरोना वायरस को लेकर अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग पर अपने कदम खींच लिए हैं. चीन के राष्ट्रपति ने इस पर साफ तौर पर तो कुछ नहीं कहा लेकिन उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि चीन कोरोना वायरस को लेकर पारदर्शी और जिम्मेदार तरीके से विश्व स्वास्थ्य संगठन को जानकारियां दी हैं.

Input : News18

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यहां मर्द मना हैं..! वो गांव, जहां सिर्फ खूबसूरत महिलाएं रहती हैं

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एक ऐसा गांव है, जहां सिर्फ महिलाओं की आबादी (Only Women) है और पुरुषों का रहना मना है. कुछ महिलाएं शादीशुदा हैं लेकिन उनके पति गांव के नियम के मुताबिक कहीं और रहते हैं. पूरा प्रशासन (Administration) महिलाओं के हाथ में है और सब दुरुस्त है. इनकी सूझबूझ का अंदाज़ा लगाइए कि फरवरी में जब Corona Virus अमेरिका (US) व यूरोप (Europe) में बड़ा कहर नहीं था, तभी इन महिलाओं ने अपने गांव को क्वारंटाइन कर लिया था यानी बाहर रहने वाले अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को गांव में आने से मना कर दिया था. जानिए कि कहां है यह गांव और क्या है इसकी कहानी.

यहां मर्द मना हैं..! वो गांव, जहां सिर्फ खूबसूरत महिलाएं रहती हैं

बेहद खूबसूरत हैं यहां की महिलाएं

जी हां, यह गांव या कस्बा 600 महिलाओं का घर है, जहां हर तरह की व्यवस्था महिलाएं खुद ही करती हैं. मीडिया में इस गांव को लेकर जो जानकारी है, उसके मुताबिक इस गांव की महिलाएं बेहद खूबसूरत हैं और ज़्यादातर कुंवारी हैं. ब्राज़ील के दक्षिण पूर्व में स्थित इस कस्बे का नाम नॉइवा डो कॉर्डिएरो है, जिसका मतलब शावक की दुल्हन होता है.

कैसे रहती हैं शादीशुदा महिलाएं?

इस कस्बे की कुछ महिलाएं शादीशुदा भी हैं लेकिन उनके पति और अगर बेटे 18 साल से ज़्यादा उम्र के हैं तो उन्हें भी इस गांव में रहने की इजाज़त नहीं है, यही यहां का नियम है. शादीशुदा महिलाओं के पतियों को कहीं और जाकर काम करना और रहना होता है और वो सिर्फ वीकेंड पर यहां आ सकते हैं.

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ब्राज़ील में महिलाओं का यह गांव सूझबूझ से लड़ रहा है कोरोना से जंग.

मर्द होते तो इतना हसीन न होता गांव?

अगर यहां मर्द होते और उनके कायदे होते तो इस गांव में इतनी खूबसूरती, इतनी अच्छी व्यवस्थाएं और इतनी आत्मीयता नहीं होती. यहां अभी कोई समस्या आती भी है तो महिलाएं मिल जुलकर उसे सुलझा लेती हैं बजाय किसी संघर्ष के. गांव में रहने वाली रॉज़ली फर्नांडीज़ ने यह भी कहा था कि यहां महिलाएं सब कुछ साझा करती हैं, ज़मीन तक. कोई किसी से मुकाबला नहीं करता. सब कुछ सबके लिए है.

कैसे बीतता है वक्त?

इस गांव में महिलाएं खेती से लेकर घर तक के सारे काम संभालती हैं. मिल जुलकर रहने वाली इन महिलाओं ने यहां एक कम्युनिटी हॉल बनाया है, जहां सब मिलकर टीवी देख सकती हैं. कुछ ही वक्त पहले यहां बड़े स्क्रीन वाले टीवी की व्यवस्था की गई. यहां महिलाओं के पास हमेशा बातें करने और गप्पें मारने का वक्त है. एक दूसरे के कपड़े ट्राय करने से लेकर एक दूसरे के बालों और नाखूनों को संवारना इनका शगल होता है.

आखिर कैसे बसा यह गांव?

इस गांव के बसने के पीछे लंबी कहानी है. 1891 में मारिया सेन्हॉरिना डि लीमा के चरित्र पर लांछन लगाकर उसके गांव से निकाल​ दिया गया था. तब मारिया ने इस जगह पर रहना शुरू किया और छोड़ी गई या अकेली महिलाओं को साथ लेकर महिलाओं का ही एक समुदाय बना लिया. इस तरह इस गांव के बसने की शुरूआत हुई.

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महिलाओं के इस गांव में एक पादरी ने प्रभुत्व जमाया था, जिसकी मौत के बाद यहां पुरुषों से तौबा की गई.

क्यों की गई मर्दों से तौबा?

इस गांव में मर्दों की हुकूमत नहीं चलेगी, यह फैसला लेने के पीछे भी लंबी कहानी है. 1940 में एक ईसाई पादरी इस गांव में आया और उसने यहां की एक लड़की से शादी करने के बाद एक चर्च की स्थापना की. इसके बाद उसने पितृसत्तात्मक व्यवस्थाएं करना शुरू किया. महिलाओं के शराब पीने, संगीत सुनने, बाल कटवाने और गर्भनिरोध के उपाय करने जैसे जीवन तरीकों पर पाबंदियां लगाना शुरू कर दीं.

जब 1995 में उस पादरी की मौत हो गई, तब यहां की महिलाओं ने पक्का इरादा किया कि अब कभी यहां किसी मर्द की हुकूमत नहीं चलने दी जाएगी. इसके बाद उस पादरी ने पुरुषवादी सोच के साथ जिस धर्म की व्यवस्था बनाई थी, उसे इन महिलाओं ने सबसे पहले ध्वस्त किया.

लेकिन मर्दो के लिए चाहत तो रही!

इस इरादे के साथ इन महिलाओं ने मर्दों को अपने समुदाय में रहने की शर्तें तय कर लीं. साल 2014 में यह गांव तब दुनिया भर में चर्चित हो गया था, जब यहां की कुछ महिलाओं ने बैचलर पुरुषों से प्यार के लिए अपील की थी. तब 23 वर्षीय नेल्मा ने सोशल मीडिया पर कहा था कि यहां की खूबसूरत महिलाएं पुरुषों के लिए बेकरार हैं. नेल्मा के शब्द कुछ इस तरह थे :

“यहां जिन पुरुषों से हम लड़कियां मिल पाती हैं, या तो वो हमारे रिश्तेदार हैं या फिर शादीशुदा ही हैं. यहां सब एक दूसरे के कज़िन ही हैं. मैंने लंबे समय से किसी पुरुष को किस नहीं किया. हम लड़कियां प्यार और शादी के लिए बेकरार हैं. लेकिन, हम यहां रहना नहीं छोड़ सकते. क्योंकि यहां रहना हमें पसंद है इसलिए एक पति के लिए इस गांव और यहां के नियमों से समझौता नहीं हो सकता.”

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गांव के नाम से बने फेसबुक अकाउंट से महिलाएं अपने जीवन और मन की बातें शेयर करती हैं.

मर्दों के लिए शर्तें

इस तरह प्यार की अपील सुनकर कई बैचलर फ्लाइट लेकर या अपनी कार से इस गांव तक पहुंच सकते थे इसलिए नेल्मा ने यह कहकर चेता भी दिया था कि ‘यहां आने वाले मर्दों को हम औरतों की हुकूमत माननी होगी.’ नेल्मा का यह भी कहना था​ कि ऐसे कई काम हैं, जो महिलाएं पुरुषों की तुलना में बेहतर करती हैं. यही यहां का नियम है कि पुरुष वो सब मानें, जो महिलाएं कहें.

कोरोना के दौर में यह गांव

महिलाओं द्वारा पूरी तरह संचालित इस गांव ने कोरोना के दौर में मिसाल भी कायम की है. ब्राज़ील और दुनिया को संदेश देते हुए यहां की महिलाओं ने न केवल अपने गांव को बाहरी लोगों से सुरक्षित किया बल्कि संक्रमण से बचाव के लिए फेस मास्क बनाए भी और दूसरे शहरों में मदद के तौर पर भेजे भी.

Input : News18

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