देश में गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लाये गए संविधान संशोधन बिल को सुप्रीम कोर्ट में पहली चुनौती दे दी गई है. ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ नाम के एक संगठन ने इस संबंध में पेश किये गए संविधान के 103वें संशोधन बिल, 2019 को चुनौती दी है. इस बिल को मंगलवार 8 जनवरी को लोकसभा में व अगले दिन बुधवार को राज्यसभा ने भी बहुमत से पास कर दिया था. संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में बिल को चुनौती देते हुए कहा है कि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और आरक्षण के लिए आर्थिक आधार एकमात्र कारण नहीं हो सकता.

सुप्रीम कोर्ट में बिल को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया है कि इसके द्वारा संविधान के आर्टिकल 15(6) और 16(6) में संशोधन किया जाना है. इसके बाद सरकार समाज में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को इस आधार पर आरक्षण देने के लिए विशेष प्रावधान लागू कर सकेगी. इसमें जिन चार धाराओं को जोड़ा गया है, वे संविधान के एक या एक से अधिक विशेषताओं का उल्लंघन करते हैं.

संगठन ने बताया है कि साल 1992 के इंदिरा साहनी वर्सेस भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सिर्फ आर्थिक कारण ही आरक्षण का एकमात्र आधार नहीं हो सकता. इस आधार पर संगठन ने मांग की है कि संविधान संशोधन पर रोक लगाई जाए और इस संबंध में एक अंतरिम आदेश पारित किया जाए.

अनुच्छेद 15 क्या कहता है :

संविधान के चैप्टर थ्री में अनुच्छेद 15 का जिक्र है. इसके अनुसार केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, या इनमें से किसी के भी आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता. इसके अनुसार अंशतः या पूर्णतः राज्य के कोष से संचालित सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों या सार्वजनिक रिसोर्ट में निशुल्क प्रवेश के संबंध में यह अधिकार राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी प्रवर्तनीय है.

हालांकि, राज्य को महिलाओं और बच्चों या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सहित सामाजिक और ‘शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों’ के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है.

अनुच्‍देद 16 क्या कहता है :

अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के संबंध में अवसर की समानता की गारंटी देता है और राज्य को किसी के भी खिलाफ केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है. इस अनुछेद में पांच क्लॉज हैं. इसी अनुछेद में राज्य द्वारा किसी वर्ग को आरक्षण देने की छूट दी गई है. वहीं हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ओर से प्रमोशन में आरक्षण के फैसले को भी इसी अनुछेद के अंतर्गत संशोधन के बाद लागू किया गया था.सरकार इसी अनुछेद में आर्थिक आधार को संशोधन के रुप में जोड़ेगी.

बिहार से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करें। हर पल अपडेट रहने के लिए APP डाउनलोड करें। ANDROID लिंक।

बता दें कि केंद्र और राज्यों में पहले ही अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी और अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए 22.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है. ऐसे में सवर्णो को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की बात पर केंद्र में सत्तारुढ़ भाजपा की ओर से कहा गया है कि सरकार आरक्षण के दायरे को 49.5 प्रतिशत से 59.5 प्रतिशत तक बढ़ाएगी.

Input : Live Cities