बिहार में कर्ज वसूली के दौरान उत्पीड़न की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए राज्य सरकार ने कड़ा कदम उठाया है। प्रस्तावित बिहार सूक्ष्म वित्त संस्थाएं धन उधार विनियमन एवं प्रपीड़क कार्रवाई निवारण विधेयक 2026 में स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई कर्जदाता या उसका एजेंट वसूली के दौरान शारीरिक या मानसिक यातना देता है तो उसे तीन से पांच साल तक की सजा हो सकती है। इसके साथ ही पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का भी प्रावधान रखा गया है।

यह विधेयक राज्य में संचालित सूक्ष्म वित्त संस्थानों और छोटे स्तर पर ऋण देने वाले व्यक्तियों की गतिविधियों को विनियमित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। गुरुवार को विधानसभा में विधेयक की प्रति सदस्यों के बीच वितरित की गई।

डिजिटल उत्पीड़न पर भी सख्ती

प्रस्तावित कानून में केवल शारीरिक यातना ही नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यम से परेशान करने को भी दंडनीय माना गया है। किसी उधारकर्ता की पहचान का दुरुपयोग, अवैध निगरानी, फर्जी प्रतिरूपण के जरिए धमकी देना, जरूरी दस्तावेज जब्त करना या परिवार और बच्चों पर दबाव बनाना—इन सभी मामलों में अधिकतम पांच साल तक की कैद या पांच लाख रुपये तक का जुर्माना, अथवा दोनों सजा का प्रावधान किया गया है।

आत्महत्या की स्थिति में कड़ी कार्रवाई

विधेयक में यह भी उल्लेख है कि यदि किसी उधारकर्ता या उसके परिवार के सदस्य द्वारा आत्महत्या की जाती है और जांच में यह साबित होता है कि घटना का कारण उत्पीड़नपूर्ण वसूली थी, तो संबंधित कर्जदाता या एजेंट को दोषी माना जाएगा। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 108 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

राज्य सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य ऋण वसूली की प्रक्रिया को पारदर्शी और मानवीय बनाना है, ताकि जरूरतमंद लोगों का आर्थिक शोषण रोका जा सके।

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