छोटी सफलता को खुद पर हावी न होने दें, नहीं तो बड़ा लक्ष्य नहीं पा सकेंगे

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कुछ लोग होते हैं जो अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने के बाद दूसरों का उपकार भूल जाते हैं, लेकिन बाद में इस कारण उन्हें सबके सामने शर्मिंदा भी होना पड़ता है। इसलिए जीवन में एक बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि जो व्यक्ति मुसीबत में साथ दे, उसे कभी भूले नहीं और उसकी सहायता करने के लिए हमेशा तैयार रहे। श्रीरामचरित मानस के इस प्रसंग से हम इस बात को अच्छे से समझ सकते हैं…

जब लक्ष्मण ने सुग्रीव को याद दिलाया उनका कर्तव्य…

– रामचरितमानस के अनुसार, सीता की खोज करते-करते राम और लक्ष्मण पहले हनुमान से मिले। हनुमान ने उनकी मुलाकात सुग्रीव से कराई। सुग्रीव को उसके बड़े भाई बाली ने अपने राज्य से निकाल दिया था।

– श्रीराम ने सुग्रीाव को मदद का भरोसा दिलाया। राम ने अपना वादा निभाया, बाली को मार कर किष्किंधा का राजा सुग्रीव को बना दिया। सुग्रीव को बरसों बाद राज्य और स्त्री का संग मिला। वो पूरी तरह राज्य को भोगने और स्त्री सुख में लग गया। तब वर्षा ऋतु भी शुरू हो चुकी थी।

– भगवान राम और लक्ष्मण एक पर्वत पर गुफाओं में निवास कर रहे थे। वर्षा ऋतु निकल गई। राम को इंतजार था कि सुग्रीव आएंगे और सीता की खोज शुरू हो जाएगी। लेकिन सुग्रीव पूरी तरह से राग-रंग में डूबे हुए थे।

– उन्हें यह याद भी नहीं रहा कि श्रीराम से किया वादा पूरा करना है। जब बहुत दिन बीत गए तो राम ने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। लक्ष्मण ने सुग्रीव पर क्रोध किया, तब उन्हें अहसास हुआ कि विलासिता में आकर उससे कितना बड़ा अपराध हो गया है।

लाइफ मैनेजमेंट

यह प्रसंग सिखाता है कि थोड़ी सी सफलता के बाद अगर हम कहीं ठहर जाते हैं तो मार्ग से भटकने का डर हमेशा ही रहता है। कभी भी छोटी-छोटी सफलताओं को अपने ऊपर हावी ना होने दें। अगर हम छोटी या प्रारंभिक सफलताओं में उलझकर रह जाएंगे तो कभी बड़े लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएंगे।