कोरोना के आतंक के बीच लाॅकडाउन में जीवन बिताने के बाद ज़िले में बाहर रह रहें लोगों की वापसी के साथ कोरोना संक्रमित मरीजों के मिलनें का जो सिलसिला शुरु हुआ था वो बाद के दिनों में सैकडों की संख्या में पहुँच आपके बहुत करीबियों को संक्रमित करते हुए कल समाप्त हो गया है। कोरोनाकाल में विषमताओं के बिच जीवन जीने के आदी तो हम सब हो हीं चूकें थें, कोरोना ने समाज़ में साफ़ सफ़ाई के महत्व का भी लोगों के बीच व्यवहारिक बदलाव के साथ अहसास दिलाया।

तीन की तिकड़ी हे चला कोरोना पहुँचा शुन्य पर

मुजफ्फरपुर में आंकड़ा दिलचस्प आता था, भय के बीच भी रिपोर्टिंग मजेदार लगने लगा जब शुरुआत के लगातार 6-7दिनों तक तीन हीं संक्रमित व्यक्ति मिलते रहें। धीरे-धीरे संख्या बढ़ने लगी और लोगों की मौत भी होती गयी।

सरकारी दिशानिर्देशों के पालन से हुआ कोरोना दूर और वैक्सीन से उसका डर विभिन्न गाइडलाइन्स ज़ारी होते रहें और उन्हे कड़ाई से लागू कराने के लिए शहर में हमनें लाठियां चटकते भी देखा, मास्क में पहले सब कुछ असामान्य लगता था धीरे-धीरे मास्क सामान्य और हमारी जीवन का हिस्सा बनता गया। जो दूरियां बढानी पड़ी वो दूरियां भी कोरोना के खिलाफ़ इस जंग में हमें एक हो कर लड़ने से नहीं रोक सकीं।

और,वैक्सीन तो मानों आशा की किरण बन के आइ है हालांकि अभी सिर्फ हेल्थवर्कर तक ही इसकी पहुँच है लेकिन लोगों के बीच अब भय जाता रहा है। देश के वैज्ञानिकों ने सीमित समय में जो किया उस पर हर नागरिक को गर्व है। अभी भी हमें गाइडलाइन्स का पालन करते हुए कोरोना को अपने मुजफ्फरपुर में फिर कभी वापस नहीं आने देना है।

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