पटना. लॉकडाउन से सबसे अधिक प्रभावित प्रवासी मजदूर हुए हैं। रोजी-रोटी खत्म होने के बाद जब भूखे मरने की नौबत आई तो प्रवासी अपना सामान समेट घर लौट रहे हैं। लोग पैदल, साइकिल, ट्रक या किसी और साधन से अपने घर आ रहे हैं। अपने माता-पिता के साथ घर लौट रहे मासूम बच्चे भूख से बिलखने को मजदूर हैं। रास्ते में खाना नहीं मिल रहा कि मां-बाप बच्चों की भूख मिटा सके। समस्तीपुर में एक ट्रक पर सवार कई मां मिलीं जो बच्चों को दूध की जगह पानी पिला रही थीं। साथ ही बच्चों को दिलासा दे रही थी कि रो मत, थोड़ी देर में घर आ जाएगा।

समस्तीपुर के मुसरीघरारी एनएच पर चल रहे इस ट्रक पर 65 लोग सवार होकर मुंबई से लखनऊ जा रहे थे। ट्रक पर बैठे मो. नूर आलम व मो. रियाज ने बताया कि हमारे कंपनी के मालिक ने हमें घर जाने को कहा। पैसे भी नहीं दिए। कुछ पैसे जोड़कर गाड़ी किए हैं। अब खाने को पैसे नहीं है। दो दिनों से हम लोगों ने खाना नहीं खाया।

मुजफ्फरपुर: ट्रक पर लोड थ्रेशर पर बैठकर अपने घर लौटते मजदूर।

मुजफ्फरपुर: रास्ते में टूट गया ठेला का चक्का, स्कूटर वाले ने की मदद
रोजी-रोटी छिन जाने के बाद मो. सलीम की हिम्मत गुड़गांव में रहने से जवाब दे गई। वह वहां से अपने गृह जिला मधुबनी के लिए रिक्शा-ठेले से ही चल पड़ा। जेब में रास्ते में खाने-पीने के लिए भी पैसे नहीं थे। करीब 200 किमी तय करने के बाद ठेले का अगला चक्का टूट गया। सलीम ने कहा कि मुश्किल वक्त स्कूटर से मधुबनी जा रहे दूसरे प्रवासी नसरूल ने ठेले को स्कूटर से बांध दिया। वहां से बारी-बारी से स्कूटर चलाते हुए सभी 1000 किलोमीटर तय कर मुजफ्फरपुर के लक्ष्मी चौक पहुंचे। नसरूल ने कहा कि यह काफी मुश्किल भरा सफर था। बीच-बीच में ठेला स्कूटर से अलग हो जा रहा था।

मुजफ्फरपुर: स्कूटर से ठेले को खींचकर ले जाते प्रवासी।

पश्चिम चंपारण: पत्नी ने कहा था- अबकी बार आना तो टीवी जरूर लाना; सिर पर टीवी रखकर ले आया
पश्चिम चंपारण के रामनगर नगर के मिल बहुअरी के एक मजदूर ने अपनी पत्नी की ख्वाहिश 17 दिनों में हजारों किलोमीटर की यात्रा तय कर पूरी की। अरविंद ने बताया- जब वह कमाने के लिए महाराष्ट्र जा रहा था तो पत्नी ने कहा था अबकी बार आना तो टीवी जरूर ले आना। जब वहां से चलने का प्लान किया तो पत्नी की बात याद आई और अपने कमरे में रखी टीवी ले ली। आने का कोई ठोस साधन नहीं था। अधिकतर पैदल ही यात्रा करनी पड़ी। बीच-बीच में कहीं कोई सवारी मिल जाती तो कुछ दूर उससे सहयोग मिल जाता। 17 दिन सफर कर 13 मई को बेतिया पहुंचे। अभी रामनगर के क्वारैंटाइन सेंटर पर 14 दिन रहना है।

पश्चिम चंपारण: पत्नी के लिए टीवी लेकर आया अरविंद कुमार राम।

कटिहार: कई रातें सड़कों पर गुजारी, पैदल जा रहे घर

एनएच-31 के रास्ते डूमर चौक पर भागलपुर से कटिहार जा रहे 30 मजदूरों में महिला-पुरुष और बच्चे शामिल हैं। मजदूर मुकेश राम ने बताया कि सभी 30 मजदूर कोलकाता से ट्रक के सहारे झारखंड होते भागलपुर पहुंचे। भागलपुर से पैदल कटिहार जाना है। हम सभी मजदूर कटिहार के कदवा के रहने वाले हैं। हम लोग कोलकाता में भवन निर्माण में लगे थे। लॉकडाउन में कंपनी ने बाहर निकाल दिया। फिर मकान मालिक ने निकाला। कई रातें सड़कों पर गुजारी। अब कभी थकते, कभी चलते जा रहे हैं। अभी भी मंजिल 65 किलोमीटर दूर है।

कटिहार: एनएच-31 के डूमर चौक से गुजरते प्रवासी।

1500 किमी चलकर मुंबई से पहुंचे सासाराम
सासाराम में मजदूरों का समूह गुजर रहा था। बातचीत करने पर बताया कि वे सब मुंबई की एक फैक्टरी में काम करते थे। एक माह ठहरने के बाद जब पैसा खत्म होने लगा तो सबने लौटने का फैसला किया। 1500 किमी की दूरी कभी पैदल तो कभी ट्रक या किसी गाड़ी पर बैठ कर तय किया। अभी 300 किमी दूरी तय कर मोतिहारी जाना है।

सासाराम: मुंबई से मोतिहारी जाते मजदूर।

दरभंगा: गुड़गांव से ट्रक में सवार होकर आए 55 लोग
दरभंगा में प्रवासी मजदूरों की भीड़ दिल्ली मोड़ एवं एनएच-57 पर दिखी। इनमें कुछ लोग ऐसे थे जो गुड़गांव से ट्रक में सवार होकर अपने घर जा रहे थे तो कुछ लोग मुंबई से बस से दिल्ली मोड़ पहुंचे थे। मजदूर परिवार के साथ ट्रक में सवार होकर सुपौल जिले तक का सफर कर रहे थे। यात्रा कर रहे अजय और हेमंत ने बताया कि 55 लोग ट्रक में सवार होकर आ रहे हैं।

दरभंगा: ट्रक के ढाला में बैठकर और पीछे लटककर गुड़गांव से आए 55 मजदूर।

सीतामढ़ी से पैदल कटिहार के लिए निकले मजदूर
सीतामढ़ी में इंजीनियरिंग कॉलेज का निर्माण कार्य बंद होने के बाद मजदूरों को परिवार के साथ कटिहार जाना पड़ा। कटिहार जाने के लिए कोई संसाधन नहीं मिलने पर मजदूर पैदल ही रवाना हो गए। मजदूरों को 330 किमी की दूरी पैदल तय करनी होगी।

सीतामढ़ी से कटिहार पैदल जा रहे मजदूर।

Input : Dainik Bhaskar

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