अगर ज्योति को साइकलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने न्यौता दिया है तो उन हज़ारों मज़दूरों की क्या गलती है जो कई हज़ार किलोमीटर पैदल चले और शायद अभी भी चल रहे हैं. उन्हें भी मैराथन में भागने के लिए बुलाना चाहिए और लॉकडाउन के दौरान जो दृश्य सड़कों पर दिखे या अभी भी दिख रहे हैं उन्हें पलायन या कुव्यवस्था नहीं, भारत सरकार का ‘मेगा टैलेंट हंट’ बता दे देना चाहिए.

-ज्योति कुमारी के नाम का डाक टिकट हुआ जारी.

-सुपर 30 वाले आनंद कुमार ने कहा- फ्री में कोचिंग देंगे.

-बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कहा- शादी में मदद करेंगे.

– केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ज्योति को बताया साहसी.

-लोजपा के नेता और सांसद चिराग़ पासवान ने ज्योति कुमारी को राष्ट्रपति से सम्मान दिलवाने के लिए लिखी चिट्टी.

-अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रम्प ने भी ज्योति कुमारी को सराहा.

-ट्विटर पर चला #proudofyou.

ये उन हजारों हेडलाइन्स में से कुछ हैं जो पिछले तीन-चार दिन में ज्योति कुमारी के इर्दगिर्द लिखी गई हैं. इतने के बाद ये मान कर चला जा सकता है कि आप 15 साल की उस ज्योति से परिचित होंगे जिसने अपने घायल पिता को साइकल पर बिठा कर गुरुग्राम से दरभंगा तक की यात्रा तय की या यों कहें कि जिसे ये यात्रा करनी पड़ी.

लगभग 8 दिनों में 12 सौ किलोमीटर की की यात्रा तय करने वाली ज्योति कुमारी की चर्चा आज हर ओर है. आपने कभी सोचा है कि ये चर्चा, ये वाहवाही और ये शाबाशी ज्योति को क्यों मिल रही है? क्यों पूरा का पूरा सिस्टम जिसमें मीडिया, नेता और अधिकारी सब हैं, ज्योति के नाम की माला जप रहे हैं?

अगर आपको लगता है कि ज्योति की कहानी ने सबका मन मोह लिया है. सब अंदर तक हिल गए हैं. सबका कलेजा मुंह को आ गया है और सब उसकी मदद के लिए आगे बाढ़ रहे हैं तो आप सौ प्रतिशत गलत सोच रहे हैं.

ज्योति कुमारी की तारीफ़ इसलिए हो रही है ताकि आपका ध्यान असल मुद्दे की तरफ से हट जाए. केवल असल मुद्दे ही नहीं आप उस हिम्मती लड़की की कहानी को भी भूल जाएं और याद रखें कि कैसे एक मंत्री के कहने पर दूसरे मंत्री ने साइकलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया से न्यौता दिलवा दिया. आप याद रखें कि कैसे जमुई से सांसद चिराग़ पासवान ने ज्योति को राष्ट्रपति से सम्मान दिलवाने के लिए पत्र लिखा है. आदि, आदि.

कोशिश ये भी है कि ज्योति कुमारी की तारीफ और उनको दिए जा रहे तरह-तरह के ऑफर्स के सहारे आपके दिमाग से सिस्टम के फ़ेलियोर जैसी किसी बात को निकाला दिया जाए. कोरोना की वजह से बिना पूरी प्लानिंग के लॉकडाउन लगाकर लाखों मज़दूरों, दिहाड़ी मज़दूरों और कई दूसरी ‘ज्योति’ को उनके हाल पर छोड़ देने को भुला दिया जाए.

भुला दिया जाए कि सूरत, मुम्बई, दिल्ली और हरियाणा में जमा हुए मज़दूरों पर लाठियां भांजी गईं. जब मुम्बई में सबसे पहले मज़दूर जमा हुए तो मस्जिद को बीच में लाने की कोशिश की गई. भुला दिया जाए कि अपने पहले संबोधन से लेकर आख़िरी तक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सबके के बारे में कुछ ठोस नहीं कहा. झूठी तारीफ करने के अलावा.

ज्योति अगर अपने बीमार बाप को साइकिल पर बिठा कर 12 सौ किलोमीटर चली और आठ दिन में अपने गांव पहुंची तो केवल इसलिए कि ‘विश्व गुरु’ बनाने के लिए कुलबुलाने वाले इस देश की सिस्टम ने उसे और उसके पिता को बेसहारा छोड़ दिया. उसके पास ‘मरता, क्या नहीं करता’ वाली स्थिति थी.

अगर ज्योति को साइकलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने न्यौता दिया है तो उन हज़ारों मज़दूरों की क्या गलती है जो कई हज़ार किलोमीटर पैदल चले और शायद अभी भी चल रहे हैं. उन्हें भी मैराथन में भागने के लिए बुलाना चाहिए और लॉकडाउन के दौरान जो दृश्य सड़कों पर दिखे या अभी भी दिख रहे हैं उन्हें पलायन या कुव्यवस्था नहीं, भारत सरकार का ‘मेगा टैलेंट हंट’ बता दे देना चाहिए.

ज्योति इस यात्रा पर इसलिए नहीं निकली थी कि वो किसी को कुछ प्रूव कर सके या उसका ऐसा करने का मन हो रहा था. वो निकली क्योंकि इस देश के प्रधानमंत्री, इस देश के मुख्यमंत्रियों, विधायकों, सांसदों और मोटी-मोटी किताबें पढ़कर अधिकारी बने लोगों ने उसके और उस जैसी हजारों ज्योति के लिए कुछ किया नहीं नहीं. कुछ नहीं सोचा. सिस्टम अपनी इसी विफलता को ज्योति के बहाने कवर करने की कोशिश कर रहा है और एक बात, सिस्टम में सब आते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गांव के पटवारी और ज़िले के बाबू तक. मीडिया भी इसी सिस्टम का हिस्सा है और वो भी ज्योति के बहाने ख़ुद को बचा रहा है.

Input : Asiaville News

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