सूद पर पैसा लगाने का कारोबार जिले में काफी लंबे समय से चल रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर तबके से लेकर संभ्रांत परिवार तक के लोग सूदखोरों की गिरफ्त में फंसकर अपना सबकुछ गंवा चुके हैं। कालांतर में इसकी जद में 60 से 70 फीसद गरीब लोग थे। लेकिन, अब यह सिमट कर बीस से तीस फीसद तक पहुंच गया है। सूदखोरों की चपेट में अब बस आर्थिक रूप से कमजोर तबके के वैसे लोग ही उनकी चंगुल में शेष है, जिन्हें बैंकों से कर्ज नहीं मिल रहा।

यानि बैंकों से कर्ज लेने के लिए जिनके पास अनिवार्य कागजात नहीं है। ऐसे लोग ही अपने कामों के लिए सूदखोरों के पास जाते है। ऊंची ब्याज कीमताें पर उनसे पैसा उधार लेते हैं। मूलधन बढ़ता जाता है, ब्याज की रकम कम नहीं होती। नतीजा, सूदखोरों के चक्कर में ब्याज की रकम चुकाते-चुकाते अपना घर-द्वार तक गंवा बैठते हैं। ऐसे सूदखोरों का कारोबार ना केवल शहरों तक फैला है, बल्कि गांव-गांव में ऐसे कई सूदखोर है, जिनकी आजीविका इसी से चलती है। जिले में ऐसे कई लोग है जो व्यापार के लिए भी ऊंची ब्याज दर पर सूदखोरों से पैसा लेते हैं। वार्षिक दो से चार प्रतिशत ब्याज पर लोग सूद पर पैसा उठाकर व्यवसाय कर रहे हैं।

नाम नहीं छापने की शर्त पर कटहलबाड़ी के एक युवक ने बताया कि यहां कई ऐसे लोग है, जिन्होंने सूद पर पैसा करोड़ों की संपति खड़ी की है। सूद के पैसे से ही इनका परिवार चलता है। सूद नहीं देने पर ये लोगों को तरह-तरह से प्रताड़ित भी करते है। इनकी पकड़ पुलिस प्रशासन में भी अच्छी खासी है। शिकायत करने पर भी कोई सुनवाई नहीं होती है।

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शहर के कई व्यवसायी सूद के पैसे से चला रहे व्यापार

शहर के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी ने बताया कि किसी कारण व्यापार को पहुंचे नुकसान की भरपाई करने और अपने आप को फिर से खड़ा करने के लिए कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ता है। यदि व्यापार ठीक-ठाक चले तो बैंक भी आगे आकर ऋण देने को तैयार रहता है। लेकिन, विपरीत परिस्थितियों में बैंकों का साथ नहीं मिलने से सूद पर पैसा उठाना पड़ता है। ऊंची ब्याज कीमत देकर किसी तरह व्यापार को खड़ा करने की कोशिश की जाती है।

गांव के कई परिवार महीने की कमाई से भरते सूद की रकम

बहादुरपुर प्रखंड के सिमरा-नेहालपुर के एक व्यक्ति ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व घर की आर्थिक तंगी के कारण कटहलबाड़ी के एक व्यक्ति से सूद पर कुछ पैसे लिए। पांच साल तक ब्याज की रकम भरी। घर में तीन कमाऊ लोग है। सभी की मासिक सैलेरी का आधा से अधिक भाग सूद के पैसा का ब्याज भरने में चला जाता है।

Source: Dainik Jagran

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