पटना: बिहार में बाहुबलियों की तूती सिर चढ़ कर बोलती है, ये कहा जाय तो गलत नहीं होगा. चाहे वो 90 के दशक के बाहुबली हों या वर्तमान की राजनीति में धाक जमाने वाले बाहुबली, सबके लिए स्थान रिजर्व है. इस कड़ी में बाहुबली आनंद मोहन का नाम हमेशा ऊपर रहता है. जिनके ऊपर हत्या, लूट, अपहरण, फिरौती, दबंगई समेत दर्जनों मामले दर्ज हैं. आनंद मोहन एक डीएम की हत्या के मामले में सहरसा जेल में बंद है. एक समय में आनंद मोहन की तूती न ही पूरे सहरसा में बल्कि बिहार के कई जिलों में भी बोलती थी लेकिन तकरीबन 15 साल से आनंद मोहन जेल की सजा काट रहे हैं.

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कौन हैं बाहुबली आनंद मोहन

आनंद मोहन का जन्म 26 जनवरी 1956 को बिहार के सहरसा जिले के नवगछिया गांव में  एक स्वतंत्रता सेनानी के परिवार में हुआ था. आनंद मोहन के दादा एक स्वतंत्रता सेनानी थे. उनके पिता परिवार के मुखिया थे. आनंद मोहन के 17 साल के उम्र में बिहार में जेपी आंदोलन शुरू हुआ है और यहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई. कहते हैं कि बिहार की राजनीति दो चीजों पर चलती है. पहली जाति और दूसरी है दबंगई. आनंद मोहन ने भी इन्हीं दोनों चीजों का सहारा लिया और राजनीति में कदम रखा. इनका पूरा नाम है आनंद मोहन सिंह है. इनकी पत्नी का नाम लवली आनंद है जो पूर्व में सांसद भी रह चुकी हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में लवली आनंद और बेटे चेतन आनंद हाल ही में राजद में शामिल हुई हैं. जिसके बाद चुनाव में बेटे की जीत हुई है.

Former Bihar MP Anand Mohan claims threat to life from jail superintendent - India News

80 के दशक में बाहुबली नेता बन चुके थे आनंद मोहन, 1990 में राजनीति में उतरे

80 के दशक में ही बिहार में आनंद मोहन बाहुबली नेता बन गए थे. उन पर कई मुकदमे भी दर्ज हुए. आनंद मोहन को 1983 में पहली बार तीन महीने के लिए जेल जाना पड़ा था. 1990 के विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन जनता दल के टिकट पर महिषी से चुनाव लड़े और कांग्रेस के लहतान चौधरी को 62 हजार से ज्यादा वोट से हरा दिया. ये वो समय था जब देश में मंडल आयोग को लागू की गई थी. जिनमें सबसे अहम बात थी कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27% का आरक्षण देना. जिसे जनता दल ने भी समर्थन दिया था लेकिन, आनंद मोहन ने इस आरक्षण का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने 1993 में जनता दल से अलग होकर अपनी पार्टी बना ली, जिसका नाम ‘बिहार पीपुल्स पार्टी’ यानी बीपीपी रखा. आनंद मोहन ने बाद में समता पार्टी से हाथ मिला लिया.

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डीएम की हत्या के मामले में मौत की सजा मिली थी

जिस समय आनंद मोहन ने अपनी चुनावी राजनीति शुरू की थी, उसी समय 1994 में  मुजफ्फरपुर में बाहुबली नेता छोटन शुक्ला की हत्या हो गई. आनंद मोहन और छोटन शुक्ला की दोस्ती काफी गहरी थी. आनंद उनके अंतिम संस्कार में भी पहुंचे. छोटन शुक्ला की अंतिम यात्रा के बीच से एक लालबत्ती की गाड़ी गुजर रही थी, जिस गाड़ी में सवार थे गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया. लालबत्ती की गाड़ी देख भीड़ भड़क उठी और जी कृष्णैया को पीट-पीटकर मार डाला. जी कृष्णैया की हत्या का आरोप आनंद मोहन पर लगा. आनंद मोहन पर आरोप लगा कि उन्हीं के कहने पर भीड़ ने डीएम की हत्या कर दी. आनंद की पत्नी लवली आनंद का नाम भी आया. इस मामले में आनंद मोहन को जेल हो गई. 2007 में निचली अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुना दी. आनंद मोहन देश के पहले ऐसे पूर्व सांसद और पूर्व विधायक हैं, जिन्हें मौत की सजा मिली हालांकि, पटना हाईकोर्ट ने दिसंबर 2008 में मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी जुलाई 2012 में पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. आनंद मोहन अभी भी जेल में ही हैं.

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Source : ABP News

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