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देवघर में आज से खुलेगा बाबा का मंदिर, E-Pass के लिए रजिस्‍ट्रेशन शुरू

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झारखंड में अनलॉक को लेकर जारी नए दिशा-निर्देशों के साथ ही प्रदेश भर में मंदिरों को खोलने की तैयारी चल रही है. मंदिर में प्रवेश करने के लिए E-Pass बनवाना जरूरी होगा. इसके जरिए ही बाबा वैद्यनाथ धाम समेत झारखंड के अन्‍य मंदिरों में प्रवेश की अनुमति मिलेगी. E-Pass बनवाने के लिए पहले रजिस्‍ट्रेशन करना होगा. इसके लिए वेबसाइट का लिंक जारी किया जाएगा. बाबा वैद्यनाथ मंदिर को गुरुवार के बजाए शुक्रवार से खोला जाएगा. झारखंड सरकार में कई महीनों बाद मंदिरों को खोलने की अनुमति दी गई है. हालांकि, मंदिर में प्रवेश के लिए कई तरह के मापदंड तय किए गए हैं. इन शर्तों का पालन करना अनिवार्य होगा.

देवघर जिला प्रशासन ने ई-पास के लिए वेबसाइट में जो व्यवस्था की है, उसके अप्रूवल के लिए उसे NIC को भेज दिया गया है. अप्रूवल मिलते ही वेबसाइट का लिंक शेयर कर दिया जाएगा. लिंक सार्वजनिक होते ही श्रद्धालु बाबा भोलेनाथ के मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए E-Pass का रजिस्ट्रेशन करा सकेंगे.

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देवघर के डीसी ने बताया कि बाबा बैद्यनाथ मंदिर में रोजाना सुबह 6 बजे से शाम 4 बजे तक आम श्रद्धालुओं को प्रवेश मिलेगा. हर दिन 10 घंटे मंदिर के पट खुले रहेंगे. प्रति घंटे 100-100 श्रद्धालुओं को जलार्पण/दर्शन की अनुमति होगी. कोविड गाइडलाइन का पालन करते हुए अभी प्रतिदिन 1000 श्रद्धालु ही बाबा मंदिर में पूजा कर पाएंगे. बिना E-Pass के किसी भी श्रद्धालु को बाबा मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा.

बाबा के मंदिर में प्रवेश के लिए जो भी लोग E-Pass के लिए ऑनलाइन आवेदन करेंगे, उनके लिए आधार कार्ड अनिवार्य होगा. कोविड संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए अभी 18 वर्ष से नीचे के किसी भी भक्त को बाबा मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा. साथ ही जिला प्रशासन विचार कर रहा है कि E-Pass सिस्टम में कोविड वैक्सीन का कम से कम एक डोज लिए व्यक्ति को ही पास जारी हो. इस व्यवस्था को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है.

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Source : News18

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मकर संक्रांति से आरंभ होता है देवताओं का दिन व उत्तरायण

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मकर संक्रांति से ही देवताओं का दिन और उत्तरायण का शुभारंभ होता है। इस दिन स्नान न करने वाला व्यक्ति जन्म जन्मान्तर मे रोगी तथा निर्धन होता है। वेदों में पौष को रहस्य मास कहा गया है। सूर्यास्त के बाद मकर संक्रांति होने पर पूण्य काल अगले दिन होता है। मकर संक्रांति लगने के समय से 20 घटी (8 घंटा) पूर्व और 20 घटी (8 घंटे) पश्चात पूर्ण काले होता है। उक्त बातें भभुआ शहर के विद्वान डॉ. विवेकानंद तिवारी ने कही। उन्होंने बताया कि मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान, हवन करने का शुभ फल मिलता है। भगवान शिव का घी से अभिषेक करने का विशेष महत्व होता है। स्वर्ण दान तथा तिल से भरे पात्र का दान करना अच्छे फल को देता है।

उन्होंने बताया कि दक्षिणायन को नकारात्मकता व उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। उत्तरायण के छह माह में देह त्याग करने वाले ब्रह्म गति को प्राप्त होते हैं जबकि और दक्षिणायन के छह माह में देह त्याग करने वाले संसार में वापिस आकर जन्म मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही कारण था कि भीष्म पितामह महाभारत युद्ध समाप्ति के बाद मकर संक्रान्ति की प्रतीक्षा में अपने प्राण को रोके अपार वेदना सह कर शर-शैय्या पर पड़े रहे। सूर्य की राशि में परिवर्तन हुआ और भीष्म पितामह के प्राणों ने देवलोक की राह ली।

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डॉ. विवेकानंद ने बताया कि मकर संक्रांति के दिन पितरों के लिए तर्पण करने का विधान है। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं और भगीरथ के पूर्वज महाराज सागर के पुत्रों को मुक्ति प्रदान की थी। इसीलिए इस दिन बंगाल में गंगासागर तीर्थ में कपिल मुनि के आश्रम पर विशाल मेला लगता है, जिसके बारे में मान्यता है कि ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार। तीर्थराज प्रयाग में लगने वाले कुम्भ और माघी मेले का पहला स्नान भी इसी दिन होता है।

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जानें हनुमान जी पर सिंदूर का चोला चढ़ाने की वजह और उससे जुड़ी रोचक कहानी

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हिन्दू मान्यताओं में मंगलवार का दिन हनुमान जी  को समर्पित किया गया है. महाबली हनुमान अजर-अमर हैं. उन्हें कलयुग का भगवान भी कहते हैं. प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हनुमान अपने भक्तों का भी खूब अच्छी तरह ख्याल रखते हैं. शास्त्रों में हनुमान बाबा को प्रसन्न करने के लिए तमाम उपाय बताए गए हैं. उन्हीं में से एक है हनुमान जी का चोला. बजरंगबली को चोला अत्यंत प्रिय है. यदि कुंडली में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है तो मंगलवार को और यदि शनिवार के दिन चढ़ाया जाए तो शनि की साढ़ेसाती, ढैया के प्रभाव धीरे धीरे कम हो जाते हैं. जानिए क्यों हनुमान जी को इतना पसंद है चोला.

हनुमान जी को सिंदूरी चोला चढ़ाये जाने को लेकर एक प्रसंग मिलता है, कि जब वनवास के दौरान एक बार माता सीता अपनी मांग में सिन्दूर भर रहीं होतीं हैं. तब हनुमान जी वहां पहुंच जाते हैं और माता सीता को सिन्दूर भरते हुए देखते हैं, तो माता सीता से पूछते हैं कि मांग में सिन्दूर भरने का कारण क्या है?

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तब माता सीता, हनुमान जी को बताती हैं कि सुहागिन स्त्रियां अपनी मांग में सिन्दूर अपने पति की लम्बी उम्र और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए भरती हैं. इस बात को जानकार हनुमान जी ने सोचा यदि माता के इतना सा सिन्दूर अपनी मांग में भरने से श्री राम की आयु लम्बी हो सकती है तो ज्यादा सिन्दूर लगाने से उनकी उम्र और लम्बी हो जाएगी.

इसी के चलते हनुमान जी ने भगवान राम की लम्बी आयु के लिए अपने पुरे शरीर को सिन्दूर से रंग लिया. इसके बाद जब हनुमान श्री राम के पास गए, और श्री राम ने जब हनुमान जी को सिन्दूर में लिपटे देखा तो उनसे इसका कारण पूछा. तब माता सीता की बात उन्होंने श्री राम को बताई. हनुमान जी की बात सुनकर और उनका अपने प्रति निश्छल प्रेम देखकर श्री राम भावुक हो गए और प्रसन्न होकर उन्होंने हनुमान जी को वरदान दिया कि अगर कोई शनिवार और मंगलवार को हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएगा तो उनकी कृपा सदैव उन भक्तों पर बनी रहेगी.

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(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. मुजफ्फरपुर नाउ इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

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असम के कामख्‍या धाम से पहुंचकर थावे आई थीं मां दुर्गा, यहां आने वाली की हर मनोकामना होती है पूर्ण

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बिहार में नए साल की खुशियां मनाने के लिए लोग पर्यटन स्‍थलों के अलावा मंदिरों में जाना अधिक पसंद करता है। राज्‍य के कुछ प्रमुख मंदिरों में पहली जनवरी को श्रद्धालुओं का उत्‍साह देखते ही बनता है। ऐसे देवस्‍थलों में गोपालगंज का थावे मंदिर खास अहमियत रखता है। यहां बिहार ही नहीं, उत्‍तर प्रदेश के कई जिलों से भी लोग दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। थावे में मां दुर्गा का मंदिर है, जहां नवरात्र में खूब भीड़ उमड़ती है। इसके साथ पहली जनवरी के मौके पर भी यहां श्रद्धालुओं का आगमन अधिक होता है। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मां सभी मनोकामनाएं पूरा करती हैं।

Thawe Mata Mandir

सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी है मां का नाम

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गोपालगंज जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर सिवान जाने वाले मार्ग पर थावे नाम का एक स्थान है, जहां दुर्गामंदिर थावे वाली का एक प्राचीन मंदिर है। मां थावे वाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी के नाम से भक्त पुकारते हैं। ऐसे सालों भर मां के भक्त आते हैं, परंतु शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है।

Durga Mata Temple, Thawe, Gopalganj, Bihar – Gyani Mudra

असम के प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामख्‍या धाम से जोड़ा जाता है नाता

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मान्यता है कि यहां मां अपने भक्त रहषु के बुलावे पर असम के कामख्या स्थान से चलकर यहां पहुची थीं। कहा जाता है कि मां कामाख्या से चलकर कोलकाता (काली के रूप में दक्षिणेश्वर में प्रतिष्ठित), पटना में पटन देवी के नाम से जानी गई, आमी (छपरा जिला में मां दुर्गा का एक प्रसिद्ध स्थान), घोड़ाघाट होते हुए थावे पहुची थीं और रहषु के मस्तक को विभाजित करते हुए साक्षात दर्शन दी थीं। इस मंदिर के पीछे एक प्राचीन कहानी है।

रहषु से मिलने बाघ पर सवार होकर आती थीं मां दुर्गा

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जनश्रुतियों के मुताबिक चेरो बंश के मनन सिंह थावे में राजा थे। वे अपने आपको मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे। उनके शासनकाल में राज्य में अकाल पड़ गया और लोग खाने को तरसने लगे। तब थावे में मां कामख्या देवी का एक सच्चा भक्त रहषु रहता था। कथा के अनुसार रहषु मां की कृपा से दिन में कतरा (घास) काटता था। लोक कथाओं में कहा जाता है कि रात में देवी मां सात बाघों पर सवार होकर आती थीं। बाघ ही रहषु के धान की दंवरी करते थे, जिससे मक्सरा धान का चावल निकलता था। अगले दिन सारा चावल इकट्ठा करके जनता जनार्दन में बांट दिया जाता था। इस बात की जानकारी राजा को मिली, परंतु राजा को विश्वास नहीं हुआ।

Thawe temple of Bihar gopalganj Maa Durga. – ashish1998blog

कोलकाता, पटना और आमी होते हुए थावे पहुंची थीं मां

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राजा ने महामंत्री और सेना को आदेश दिया कि रहषु को बंदी बनाकर दरवार में हाजिर किया जाए। रहषु को दरबार में पेश किया गया। राजा ने रहषु को ढोंगी बताते हुए मां को बुलाने को कहा। राजा जिद्दी थे। रहषु ने कई बार राजा से प्रार्थना की अगर देवी मां यहां आएंगी तो राज्य बर्बाद हो जायेगा, परंतु राजा नहीं माने। रहषु की प्रार्थना पर मां कोलकाता, पटना, आमी और घोड़ा घाट होते हुए यहां पहुंची। राजा के सभी भवन गिर गए। देवी मां ने रहषु भक्त का मस्तक फाड़ कर अपने दाहिने हाथ का कंगन दिखा दिया। इसी के साथ राजा-रानी समेत पूरा परिवार खत्म हो गया।

देवी मंदिर से कुछ ही दूरी पर है रहषु भगत का मंदिर

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मां ने जहां दर्शन दिया, वहां एक भव्य मंदिर है तथा कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी मंदिर है। मान्यता है कि जो लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं, वे रहषु भगत के मंदिर भी जरूर जाते हैं। मंदिर के आसपास के लोगों के अनुसार यहां के लोग किसी भी शुभ कार्य के पूर्व और उसके पूर्ण हो जाने के बाद यहां आना नहीं भूलते। यहां मां के भक्त प्रसाद के रूप में नारियल, पेड़ा और चुनरी चढ़ाते हैं।

तीन तरफ से जंगलों से घिरा हुआ था मंदिर

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मंदिर का गर्भ गृह बहुत पुराना है। तीन तरफ से जंगलों से घिरे इस मंदिर के गर्भ गृह में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। नवरात्र की सप्तमी को मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन भक्त मंदिर में काफी संख्या में पहुंचते हैं। इस मंदिर की दूरी गोपालगंज से छह किलोमीटर है। राष्‍ट्रीय राजमार्ग 85 के किनारे स्थित मंदिर सिवान जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर है। सिवान थावे से कई सवारी गाड़ियां आती है, जबकि थावे जंकशन से एक किलोमीटर की दूरी पर मंदिर है। थावे जंकशन से मंदिर जाने के लिए ई-रिक्शा मौजूद रहता है। यहां तक कि थावे बस स्टैंड से मंदिर जाने के लिए सवारी हमेशा मौजूद रहती है।

सोमवार और शुक्रवार को अधिक होती है भीड़

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वर्तमान में खरमास चढ़ने के कारण दुर्गामंदिर में श्रद्धालुओं का आना कम हो गया है, लेकिन सोमवार और शुक्रवार के दिन खरमास में श्रद्धालु पूजा करने के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे तो कुछ न कुछ तो श्रद्धालु पूजा करने के लिए प्रतिदिन आ रहे हैं। खरमास के चलते यहां सगाई और विवाह का कार्यक्रम बंद है। मंदिर परिसर में हमेशा ही मांगलिक कार्यक्रम होते रहते हैं। मंदिर परिसर के इर्द-गिर्द मांगलिक कार्यक्रम करने के लिए गेस्ट हाउस भी बने हुए हैं।

Source : Dainik Jagran

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