बिहार में भले ही दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए लेकिन, चुनाव ऐसे लड़ा गया जैसे आम चुनाव हो. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने चार चुनावी सभाएं की. नीतीश मंत्रिमंडल के एक के बाद एक कई मंत्रियों ने पूरे चुनाव के दौरान धुआंधार चुनाव प्रचार किया. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कुशेश्वरस्थान और तारापुर, दोनों ही जगहों पर डेरा डाल दिया था. यहां तक कि तेजस्वी ने चुनाव को जरूरी बताते हुए विधानसभा के शताब्दी समारोह में भी जाना मुनासिब नहीं समझा, जिसके मुख्य अतिथि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद थे.

इस उपचुनाव में मुख्य विपक्ष की तरफ से जिसका सबसे ज्यादा इंतजार किया जा रहा था वो थे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव. 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने लालू यादव का पोस्टर तक इस्तेमाल नहीं किया था. पार्टी तेजस्वी यादव की अगुवाई में अतीत की छवि से निकल कर चुनाव मैदान में उतरी थी. पर आरजेडी ने अपने उसी सबसे बड़े नेता का तभी से इंतजार करना शुरू कर दिया था जब उन्हें जमानत के बाद दिल्ली एम्स से छुट्टी नहीं मिली थी. दिल्ली में डॉक्टरों की इजाजत के बाद लालू यादव अपनी बेटी और राज्यसभा सांसद मीसा भारती के आवास पर रहकर स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे.

बेटे तेजस्वी को राजनीति में स्थापित करने बिहार लौटे लालू यादव
लालू यादव अपनी कर्मभूमि बिहार कब आएंगे इसे लेकर कई महीनों तक अटकलें लगाई जाती रहीं. परिवार की तरफ से हवाला दिया गया कि उनकी सेहत इसकी इजाजत नहीं देता. स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो लालू यादव समय पर जरुर पटना आएंगे. यह मौका आया उपचुनाव से ऐन पहले. दिल्ली से पटना के लिए रवाना होने से पहले लालू यादव ने पहला सियासी बम फोड़ा बिहार कांग्रेस प्रभारी भक्त चरण दास पर. लालू ने अपने चिरपरिचित अंदाज में भक्त चरण दास को भकचोन्हर कह दिया. बिहार में भकचोन्हर का मतलब होता है बुड़बक यानी बेवकूफ.

दरअसल बिहार में जिन दो सीटों पर उपचुनाव हुए वहां आरजेडी और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़े. यह दोनों पार्टियां 2020 विधानसभा चुनाव में साथ मिलकर चुनाव लड़ी थीं. ग्यारह साल बाद दोनों ने अलग-अलग राह पकड़ी. 2020 में कुछ सीटों से सरकार बनाने से चूक गई आरजेडी को यह लगता रहा कि अगर उसने जरुरत से ज्यादा कांग्रेस को तरजीह नहीं दी होती तो पटना में लालटेन की रौशनी जल रही होती. करीब तीन साल बाद पटना आये लालू यादव ने एक के बाद एक सियासी बमों की झड़ी लगा दी. मकसद एक ही था किसी भी सूरत में अपने छोटे बेटे और राजनीतिक वारिस तेजस्वी यादव के लिए कुशेश्वरस्थान और तारापुर सीट जीतना.
घर पहुंचते ही लालू यादव ने ना सिर्फ महीनों से नाराज चल रहे अपने बड़े बेटे तेजप्रताप को समझा बुझाकर शांत किया बल्कि अपने सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी नीतीश कुमार पर जोरदार हमला बोला. बेटे तेजस्वी का आत्मविश्वास बढ़ाते हुए यहां तक कह दिया कि लाडले ने तो विधानसभा चुनाव में ही नीतीश का कचूमर निकाल दिया था और अब मैं विसर्जन करने आया हूं.

नीतीश कुमार ने संयमित भाषा में विरोधियों को जवाब दिया
अपनी संयमित भाषा के लिए जाने जानेवाले नीतीश कुमार ने अपने ही अंदाज में जवाब दिया और कहा कि लालू यादव चाहें तो उन्हें गोली मरवा दें. वो वही कर सकते हैं. उससे अधिक उनसे कुछ नहीं हो सकता.
चुनाव से ठीक एक दिन पहले शरीर से कमजोर पर मानसिक रूप से मजबूत दिख रहे लालू यादव ने एक और बड़ा धमाका किया. लालू ने कहा कि अगर दोनों सीटों पर जीत हुई तो नीतीश की सरकार वो गिरा देंगे. बिहार की राजनीति में भूचाल ला देंगे. लालू यादव ने एक के बाद एक दो रैलियां की. छह साल बाद लालू यादव ने किसी चुनावी मंच से विशाल जनसमूह को संबोधित किया. बीमारी से भले आवाज की बुलंदी कमजोर हो गई हो लेकिन बेटे को स्थापित करने की चाह में अपनी पूरी ताकत झोंक दी. लालू यादव को दोनों सीटों पर चुनाव प्रचार के लिए बुलाकर पार्टी ने अपना ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल कर लिया. लालू की सभाओं में बड़ी संख्या में लोग जुटे पर बिहार की समकालीन राजनीति के सबसे बड़े नेता नीतीश कुमार के सामने लालू यादव की सारी कोशिश नाकाम साबित हुई.

कुशेश्वरनास्थान विधानसभा चुनाव में 64 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाला, जबकि तारापुर में आधी आबादी ने करीब 50 फीसदी मतदान किया. नीतीश कुमार जिस किसी भी सभा में जाते हैं, नौकरी में महिलाओं के लिए आरक्षण, स्कूली लड़कियों के लिए मुफ्त साइकिल, पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण, 24 घंटे बिजली, शराबबंदी और बेहतर कानून व्यवस्था का हवाला देकर अपनी उपलब्धियां गिनाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस महिला मतदाता को साइलेंट वोटर कहते हैं उसी महिला मतदाता ने उपचुनाव में नीतीश कुमार की नैया पार लगा दी.
Source : News18
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