पानी बढ़ने के साथ ही गंगा किनारे डॉल्फिन पहुंचने लगी है। शहर के दीपनगर, मानिकपुर घाट आदि जगहों पर डॉल्फिन अठखेलियां करती हुई दिखाई दे रही हैं। दीपनगर घाट पर शुक्रवार को लोगों ने चार से पांच डॉल्फिन को देखा। विशेषज्ञों के अनुसार, मुख्य धार में पानी अधिक होने के कारण वह गंगा किनारे पहुंच जाती है। जहां उसे आसानी से भोजन के रूप में मछली मिल जाता है। बरसात के समय मछलियों की प्रजनन क्षमता अधिक होती है। ऐसी स्थिति में डॉल्फिन अपने बच्चों के साथ गंगा किनारे पहुंची है। डॉल्फिन दिखाई पड़ने से गंगा की स्वच्छता का भी पता चलता है। एक डॉल्फिन साधारण तौर पर तीन मिनट तक पानी के अंदर रहता है। इसके बाद कुछ पल के लिए वह सांस लेने के साथ शिकार के लिए निकलती है।

200 से अधिक है डॉल्फिन की संख्या

डीएफओ भरत चिंतापल्ली ने कहा कि डॉल्फिन भोजन की तलाश में गंगा किनारे पहुंच रही है। सुल्तानगंज से लेकर कहलगांव तक इसकी संख्या में भी वृद्धि हो रही है। लगभग 200 से अधिक डॉल्फिन इस क्षेत्र में है। उनके संरक्षण के लिए लगातार मछुआरों को जागरूक किया जा रहा है। साथ ही गंगा प्रहरियों द्वारा दूर-दराज के क्षेत्रों में जाकर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने मछुआरा से आग्रह किया कि वह मछली पकड़ने के लिए महाजाल नहीं बिछाए। इससे डॉल्फिन को नुकसान पहुंच सकता है।

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सोंस के नाम से भी जाना जाता है डॉल्फिन

गंगा प्रहरी स्पियरहेड (भारतीय वन्यजीव संस्थान) दीपक कुमार ने बताया कि पूरे देश में जितना भी डॉल्फिन पाया जाता है, उसमें बिहार सबसे समृद्ध है और यहां ही इसकी संख्या आधी है। इसे स्थानीय भाषा में सोंस के नाम से भी जाना जाता है। यह एक जलीय जीव है। सांस लेने के लिए वह कुछ पल के लिए जल से बाहर निकलती है। यह अंधी होती है। छोटी मछली डॉल्फिन को काफी पसंद है। गले की बनावट के कारण वह बड़ी मछलियां नहीं निगल पाती है।

Input: live hindustan

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