सूबे में पहली बार फरवरी से बड़े पैमाने पर पक्षियों की गणना होगी। इसके लिए हर जिले में कम से कम छह ‘बर्ड वाचर’ तैयार किये जा रहे हैं। दो साल में गणना पूरी करने का लक्ष्य है। नवंबर के पहले हफ्ते से प्रवासी पक्षियों की गणना व अध्ययन शुरू कर दिया गया है।

प्रवासी पक्षियों के आने के मौसम (अक्टूबर के अंतिम हफ्ते से मार्च तक) में छह हजार से अधिक प्रवासी पक्षियों के वृहत अध्ययन का लक्ष्य है। उन पक्षियों की रिंगिंग भी की जाएगी। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के आदेश पर बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के पक्षी विज्ञानी इस कार्य में जुट गये हैं। विशेषज्ञ जिलों में ऐसे लोगों की पहचान कर रहे हैं, जो पक्षीविज्ञान में डिग्रीधारी के साथ ही ऐसे कार्यों में रुचि रखने वाले हों।

400 से अधिक प्रजातियों के पक्षी: बिहार सरकार ने जनवरी में ‘बर्ड्स ऑफ बिहार’ नाम की दो पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इसके अनुसार सूबे में 400 से अधिक प्रजातियों के पक्षी हैं। जबकि, ‘ई-बर्ड इंडिया’ के अनुसार सूबे में 73 फैमिली की 339 प्रजातियां हैं। लेकिन अब तक सूबे में वृहत तरीके से पक्षियों की गणना नहीं हुई है। पूरे विश्व में पक्षियों की 8650 प्रजातियां हैं। इनमें से 1200 प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। इनमें 900 देसी तो 300 प्रवासी प्रजातियां हैं। 180 प्रजातियां ऐसी हैं, जिनकी उत्पत्ति व विकास भारत में ही हुआ है।

ऐसे होती है पक्षियों की गणना

पक्षियों की गणना प्वाइंट काउंट मेथड से होती है। इसमें गणना करने वालों का समूह बनता है। सबसे पहले गणना वाले क्षेत्र का अध्ययन करते हैं। इसके आधार पर उन स्थानों को चिह्नित करते हैं, जहां पक्षियों का बसेरा होता है। बसेरा के क्षेत्रफल के आधार पर कर्मियों की संख्या तय करके एक साथ वहां पहुंचते हैं। क्षेत्र की चारों दिशाओं से अलग-अलग गणना करके आंकड़ों को एकीकृत किया जाता है। प्रजातियां चिह्नित करने के लिए फोटोग्राफी की जाती है। कैमरा जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम) से लैस होता है।

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राष्ट्रीय स्तर पर बिहार में पक्षियों के रहने का सबसे उत्तम स्थान है। यहां अनुकूल जलस्रोतों की अधिकता है। यहां की खेती भी पक्षियों के भोजन के अनुकूल है। यही कारण है कि प्रवासी पक्षियों के भ्रमण के विश्व के कुल नौ ‘फ्लाईवे’ में से दो बिहार से होकर गुजरते हैं।

क्या है रिंगिंग

प्रवासी पक्षियों को पकड़कर पक्षी विज्ञानी रिंग (छल्ला) पहनाते हैं। ऐसे में वे पक्षी किन-किन देशों का भ्रमण करते हैं, पता लग जाता है। हर देश का छल्ला अलग-अलग रंग का होता है। उस पर डाला गया नंबर भी सभी देशों का भिन्न होता है।

काफी घटे प्रवासी पक्षी

वर्ष 2010-11 तक पांच लाख से अधिक प्रवासी पक्षी बिहार आते थे। सिर्फ बेगूसराय की काबर झील में सवा से डेढ़ लाख पक्षी आते थे। लेकिन, अब पूरे सूबे में बमुश्किल 50 हजार तो काबर झील में करीब 10 हजार पक्षी आते हैं। शिकारियों की संख्या बढ़ने, फसलचक्र बदलने, रासायनिक कीटनाशकों का अधिक उपयोग इसके कारक हैं। वहीं दूसरी ओर, जलस्रोतों में पानी का तान (डेप्थ ऑफ वाटर) अधिक रहने के बाद अचानक सूख जाना एक महत्वपूर्ण कारण है।

Source : Hindustan

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