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Chanakya Niti: ऐसे करें सच्चे मित्र की पहचान, नहीं मिलेगा जीवन में कभी धोखा

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आचार्य चाणक्य ने मनुष्य के जीवन के रहस्यों को सुलझाने के लिए नीतियां बनाईं. इन नीतियों के बारे में कहा जाता है कि जिसने इन नीतियों का पालन किया उसकी सफलता निश्चित है. आचार्य चाणक्य (Chanakya) ने धर्म, न्याय, शांति, सुरक्षा और राजनीति समेत कई विषयों पर नीतियां निर्धारित की हैं. आइए जानते हैं चाणक्य नीति (Chanakya Niti) के मुताबिक सच्चे मित्र की पहचान कैसे हो…

चाणक्य नीति (Chankya Niti)

1. भूलकर भी ऐसे मित्र का साथ नहीं देना चाहिए जो सामने से आपकी प्रशंसा करता है, मधुर व्यवहार करता है और आपके मन को खुश करने वाली बातें करता है, लेकिन मौका देखकर आपके पीछे बुराइयां करता है और आपके काम बिगाड़ देता है. ऐसे मित्र दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं. इसलिए ऐसे मित्रों से दूर रहना चाहिए.

2. जिसे आप सबसे अच्छा मित्र मानते हैं उस पर भी आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए. क्योंकि अगर आप अपने पक्के दोस्त के सामने अपने सभी सीक्रेट चीजों का खुलासा कर देते हैं तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि रिश्तों में खटास आने पर या मित्रता खत्म होने पर आपके सभी सीक्रेट्स को सबसे सामने रख सकता है.

3. दोस्ती हमेशा बराबर वालों से करनी चाहिए. अगर आप अपने बराबर वालों से दोस्ती नहीं करते हैं और अपने से नीचे या ऊपर के स्तर के लोगों के साथ दोस्ती करते हैं तो इस रिश्ते में दरार के आने की संभावना ज्यादा होती है. निर्धन का कोई मित्र नहीं होता जबकि धनवान व्यक्ति के आस पास मित्र के रूप में लोगों की भरमार होती है. यह वह स्थिति होती है जब धनवान यह समझ कर खुश होता है कि उसके काफी मित्र हैं और उसके दोस्त इसलिए खुश होते हैं कि धनवान उनके काम में मदद करेगा. ऐसें लोगों की पहचान करें.

4. दुख के समय में जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से आपका साथ दे वही आपका सच्चा मित्र हो सकता है. अगर कोई मित्र संकट में, बीमारी में, दुश्मन के हमला करने पर, राज दरबार में और शमशान में आपके साथ खड़ा रहता है तो वो आपका सच्चा मित्र है. यही वो समय होते हैं जब आप अपनी मित्रता को परखते हैं.

5. विपरीत स्वभाव वाले दो व्यक्तियों में कभी भी आप स में दोस्ती नहीं हो सकती. अगर ऐसा होता है तो वह रिश्ता दिखावे का होता है. क्योंकि सांप और नेवले की, बकरी और बाघ की, हाथी और चींटी की व शेरनी और कुत्ते की कभी दोस्ती नहीं हो सकती. इसी प्रकार सज्जन और दुर्जन में भी दोस्ती असंभव है.

6. अपने संगत का खयाल रखना आवश्यक है. क्योंकि संगत का असर अवश्य होता है फिर चाहे वो अच्छा हो या फिर बुरा. धीरे-धीरे ही सही लेकिन ज्यादा समय उनके साथ बिताने पर आपके दोस्तों वाले गुण आपके अंदर आने लगते हैं. इसलिए दोस्ती करते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि आपके दोस्तों की संगत आपके अनुकूल हो.

7. स्वार्थ के बल पर की हुई दोस्ती, हमेशा दुश्मनी का कारण बन जाती है. इसलिए समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह हमेशा मित्रों के चयन से पहले उसे जांच परख ले तथा खूब सोच विचार कर ले क्योंकि एक बार यदि दोस्ती गाढ़ी हो गई तो उसके बाद उसके परिणाम और दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं.

8. वाकई में अगर आपको मित्रता निभानी है तो ऐसी निभाई जाए जैसे कृष्ण और सुदामा की, कृष्ण और अर्जुन की, विभीषण और राम की बताई जाती है. ऐसे में मित्र बनाते समय उसके गुण और दोष को जान लें. वो ऐसा हो जो आपके स्वभाव से मेल खाए, संकट काल में, बिमारी में, अकाल में और कष्ट में आपके कदम से कदम मिलाकर चले.

Input : Aaj Tak

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चिंतनीय – क्या राजनेताओं के बच्चे कोरोना मुक्त, बाकी के बच्चे कोरोना कैरियर…?

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एक मध्यम वर्गीय परिवार का आदमी …….!

जिसने जीवन की सारी गाढ़ी कमाई तो बाल बच्चों को पढ़ाने में लगा दिया.. !

कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ने बाहर भेज दिया ताकि बच्चे अच्छी तरह पढ़ लिख कर बेहतर रोजगार हासिल कर सके…!

लेकिन कोरोना माहमारी ने इस वर्ग के लोंगो को घुटने के बल ला दिया । बच्चे को राजस्थान के कोटा शहर भेजा.. ,इस उम्मीद से कि वह वहां बेहतर पढ़ाई करे …।बच्चे कॉम्पिटिशन की तैयारी कर सके…इंजीनियरिंग या मेडिकल में अच्छी रिजल्ट ला सके…बढियां संस्थानों में उसे पढ़ने का मौका मिले और अभाव ..जिल्लत भरी जिंदगी से उसे निजात मिल सके.. !

सपना देखना बुरी बात नही है,उन सपनों को पूरा करने की कोशिश भी गलत नही है.. अभाव जिंदगी की हिस्सा है पर उन अभाव में कर्ज या कुछ जेवरात बेच कर…दो बक्त के रोटी से कुछ पैसे काट कर कुछ लोंगो ने अपने बच्चों को कोटा,या कुछ ने अन्य महानगरों में पढ़ने के लिए भेज दे तो किया बुरा ..?

लेकिन इस कोरोना काल मे उन बच्चों को कुछ राज्य सरकारों ने बसें भेजकर अपने घर मांगा लिया..तो कुछ सक्षम और पावरफुल लोंगों ने पास बनाकर स्वयं के गाड़ी से वापस ले आया…फंसा तो इन माध्यम वर्ग के बच्चे..जिनके मां बाप के पास ना तो पैसे हैं कि अपनी गाड़ी से ले आये या ना पावर की पास बनाकर वापस ले आये।

बिहार सरकार के अपने तर्क है..।

वहां से बच्चों को वापस लाने से कोरोना फैल जाएगा..लेकिन सरकार यह नही बताती की इसकेलिए जो प्रक्रिया हैं , जांच करने की ।फिर यहां लाकर कोरोनटाइन करने की।वह हैम नही करेंगे। सरकार जहां भयंकर कोरोना फैली थी उस बुहान से कोरोना को सौगात के रूप में बच्चों।के साथ ला सकती हैं लेकिन अपने देश में भूख प्यास से मर रहे….मां बाप से दूर रह कर तड़प रहे बच्चों को बिहार सरकार नही ला सकती।

आज बच्चों को वहां से भागने की विवशता है.. ,और मां बाप की मजबूरी! आखिर इन परिस्थितयों से गरीब के बच्चे ही क्यों जूझ रहे है ?

आज स्थिति यह है कि वे अपने बच्चो को लाने के लिए परेशान इधर उधर भटक रहै हैं । उसकी कोई सुनने वाला नही है क्योंकि व न तो वह जनप्रतिनिधि है और न ही कोई ऑफिसर है।

यह बात बिहार में चर्चा का विषय बना हुआ है । एक ओर सरकार कोरोना की वजह से बच्चो को बिहार लाने देने को तैयार नहीं। उसी बच्चे का सहपाठी जो विधायक का बेटा है वह आ गया अपने घर….अफसर का बेटा है वह आ गया अपने घर …,उसकी माँ उसको घूर घूर कर देख रही है और खुशी से चहक रही है और इस विपदा की घड़ी में वह पूरा परिवार सामर्थ्यवान होने का दंभ भर् रहा है।

वही उसी के पड़ोसी की मां अपने बच्चों को बुलाने के लिये.. अपने घर लाने के लिये ..उसके पिता के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं । लाचार व विवश मध्यमवर्गीय पिता अपने आप को कोश रहा है कि मेरा कसूर सिर्फ इतना है कि मैं मध्यमवर्गीय आदमी हूँ !

ना मैं अफसर हूँ ना मैं विधायक .ना राज नेता हूँ।

यह देखकर हैरानी हो रही हैं कि आखिर सरकार किसके लिये होती है हर आम आदमी जो अपना कीमती वोट देकर चुनता है या फिर चुनने के बाद उनकी परिक्रमा कर रहे कुछ खास लोगो के लिए ,, यह बहुत ही चिंतनीय विषय है ।

दूसरा इस सवाल का जबाब इस वक्त ढूंढना मुश्किल ही नही बल्कि नामुमकिन है कि कैसे बाहर से आने वाले राजनेताओं के बच्चें कोरोना मुक्त और आम आदमी के बच्चें कोरोना कैरियर है ?

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महाभारत से जुड़ी कुछ सुलझी और अनसुलझी जानकारी

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कहा जाता है कि महाभारत ग्रंथ को घर में रखने से घर में कलह होती है। हालांकि अभी अधिकांश घरों से रामायण की धुन के साथ महाभारत की वाणी भी सुनने के लिए मिल रही है।

धार्मिक ग्रंथों और धार्मिक चीज़ों के प्रति लोगों का विश्वास कभी कम नहीं होता क्योंकि लोगों की आस्था सीधे उससे जुड़ी होती है।

Five Character Appears In Both Ramayana And Mahabharata - पांच ...

महाभारत के समय भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था ताकि वह युद्ध करने के लिए आगे आये और बाण को धारण करे।

वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत एक ऐसा महाकाव्य है, जिसके बारे में हमारे देश का हर इंसान जानता है।

द्रोणाचार्य के जन्म से एक मजेदार कहानी जुडी है। कथा के अनुसार द्रोणाचार्य के पिता महर्षि भारद्वाज थे, जो एक बार नदी में स्नान कर रहे थे। तभी उन्हें घृताची नामक एक अप्सरा दिखाई दी, जिन्हें देखकर वह आकर्षित हो गए और उनके शरीर से शुक्राणु निकल गये। इन्हें भारद्वाज ने एक पात्र (द्रोण) में जमा कर दिया, जिससे द्रोणाचार्य का जन्म हुआ इसलिए द्रोणाचार्य को पहले टेस्ट ट्युब बेबी थे।

Mahabharat : Full and Complete Mahabharat Story/Katha in hindi ...

महाभारत का असली नाम जया (जयम) था।

आपने कौरवों के बारे में देखा और सुना होगा कि वह पांडवों के खिलाफ थे मगर सभी कौरव पांडवों के खिलाफ नहीं थे। धृतराष्ट्र के दो पुत्र विकर्ण और युयुत्सु ने ना सिर्फ दुर्योधन के गलत कार्यों पर आपति जताई थी बल्कि द्रोपदी चीरहरण का भी काफी विरोश किया था। यह दोनों युद्ध के पक्ष में भी नहीं थे लेकिन भाई से धोखा ना कर इन्होंने मज़बूरी में युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।

दुर्योधन का असली नाम सुयोधन था।

महाभारत में विदूर को यमराज का अवतार कहा जाता है।

अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु में असल में दानव की आत्मा थी। जिसका नाम काल्यान था।

भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था।

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मौत से ठीक पहले के वो 40 सेकेंड, आख़िर क्या झेलता है इंसान

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अगर आपका सनातन मान्यता और कालभैरव, देवो के देव महादेव में आस्था है तो ये स्टोरी आपके लिए ही है. हमसब जानना चाहते है आखिर मौत के ठीक पहले क्या होता है, ये कहानी पूरा पढ़े, सनातन मान्यता पर अधारित ये सत्य ही मानवता का सत्य है.

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मृत्यु अटल सत्य है, कोई मनुष्य चाह कर भी इस सत्य को परिवर्तित नहीं कर सकता है, जितना ही मौत सत्य है उतने ही सत्य है शिव, वैसे शिव को हम नाम में नहीं बांध सकते, शिव अनंत है- बाकी सब देव है परन्तु शिव महादेव है, शिव रुद्रा है, शंकर , त्रिपुरारी, सोमनाथ , बैद्यनाथ , महाकाल, काल भैरवी, औघर और अनंत नामो से पहचाने जाने वाले आदिशक्ति ही इस ब्रह्मांड के निर्माता है.

महादेव की नगरी काशी – पौराणिक मान्यताओं का आनंदवन और वर्तमान समय में वाराणसी को हम मोक्ष धाम के नाम से जानते है, कहते है काशी में मरने वाले को स्वर्ग जाकर हरिचरणों मे जगह मिलता है, और इसी मान्यता के साथ अच्छे लोगो के साथ – साथ जिंदगी भर बुरा कर्म, ग़लत काम करने वाले लोग भी मरने के समय काशी पहुँचने लगे, जिनके कर्म भी बेकार है वो भी स्वर्ग जाने की चाह में काशी पहुँचने लगें, काशी की धरती जो शिव के प्रेम के लिये जानी जाती है , वहां पापी और अपराधी भी आने लगे, देवो के लिये ये चिंता का विषय बन गया. स्वर्ग और नरक में जाने का आधार शरुआत से ही मनुष्य का कर्म रहा है, स्वर्ग का द्वार उसके लिये ही है, जो जीवन में धर्म के मार्ग पर चला हो ऐसे में अधर्मी भी महत्वाकांक्षी हो गए और देवलोक की चाह में काशी पहुँचने लगे.

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इन्ही समस्याओं का निवारण करते है महादेव के काल भैरव रूप, काल मतलब समय , शिव का वो रूप जो समय का देवता है, महादेव का महाकाल रुप भी समय के देवता है, समय अर्थात शिव, इसीलिये हम किसी के मृत्यु पर कहते है कि इसका समय खत्म हो गया, महादेव का काल भैरवी रुप इंसान के जीवन के साथ न्याय करता है, मनुष्य मृत्यु से ठीक 40 सेकेंड पहले भैरवी यातना से गुजरता है जिस 40 सेकेंड में मनुष्य के पिछले जन्म से लेकर इस जन्म और कई जन्मों के कर्म इस 40 सकेंड में उसके नज़रो के सामने तेज़ी से घूमते है. इतनी तेजी से सारे कर्म घूमने के कारण ये समय बेहद पीड़ादायी होता है, इसे भैरवी यातना कहते है, यातना अर्थात पीड़ा, कष्ट और दुख ये उसी समान है जैसी यातना मनुष्य नरक में झेलता है. इन 40 स्केंड में समय अपनी सबसे तेज गति से दौड़ता है और मरने वाला इंसान अपने सारे जन्मों के कर्म को इन्ही वक्तों में देख लेता है फिर जाकर प्राण शरीर को त्याग देता है. समय के इसी देवता को हम काल भैरव भी कहते है जो महादेव के ही रुप है, मृत्यु के पहले के ठीक पहले के ये चालीस सेकेंड सारे जीवन के कर्मो को अनन्त तेज गति से नज़रो के सामने रख देता है. मौत चाहे कैसी भी रही हो ये यातना हर किसी को झेलना है, चाहे आप किसी रोग से मरे या बूढ़े होकर मरे, हर स्तिथि में ये यातना ही मनुष्य शरीर के साथ न्याय करता है.

जीवन जीने के क्रम में हमें इन बातों का ध्यान रखना चाहिये कि मृत्यु एक दिन में नहीं आती मृत्यु रोज धीरे- धीरे आती है और एक दिन ये पूर्ण हो जाती है. मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य का निर्माता होता है. जीवन जीने के लिये आपको जो शरीर मिला है वो केवल आधारशिला है वास्तिवकता बस शिव है और जीवन जीने का उद्देश्य शिव भक्ति और सतकर्म है.

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