सीपीआई की बिहार में बुलंद आवाज रहे जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और भाकपा नेता कन्हैया कुमार ने इन दिनों पार्टी से दूरी बना ली है. कल तक कन्हैया कुमार बिहार में मृत पड़े सीपीआई (CPI) को घूम-घूमकर जिंदा करने की कोशिश कर रहे थे, पार्टी में सांस फूंकने के लिए कार्यक्रम कर रहे थे. ऐसा लग रहा था कि वह पार्टी को बिहार में फिर से जिंदा करेंगे, लेकिन आज खुद कन्हैया ने सीपीआई से दूरी बना ली है. कहा जा रहा है कि ऐसी कई वजहें रही हैं, जिसके कारण कन्हैया पार्टी से छिटकते चले गए.

सीपीआई नेता और युवा चेहरे कन्हैया कुमार के पार्टी से अलग होने की बड़ी वजह अपनी ही पार्टी द्वारा कन्हैया के खिलाफ निंदा प्रस्ताव का पारित होना बताया जा रहा है. कन्हैया पर आरोप था कि बिहार पार्टी कार्यालय सचिव इंदुभूषण के साथ मारपीट और बदसलूकी की गई. इस बात से नाराज पार्टी ने हैदराबाद में हुई तीन दिवसीय बैठक में कन्हैया के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया. इस मंच पर राष्ट्रीय महासचिव डी राजा सहित अन्य नेता मौजूद थे. कन्हैया वर्तमान में सीपीआई के नेशनल एजक्यूटिव काउंसिल के सदस्य हैं. निंदा प्रस्ताव के बाद कन्हैया अपने पार्टी के नेताओं से आहत बताए जाते हैं, जिसके कारण उनकी दूरी बढ़ती चली गई.

CPI में राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरा होना मुश्किल

जेएनयू के छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में देश भर में चर्चा का विषय बनने के बाद कन्हैया ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में शामिल होने का फैसला लिया था. सीपीआई जॉइन करने के साथ ही बेगूसराय से लोकसभा के उम्मीदवार भी बने. मगर पार्टी की कमजोर हालत और गठबंधन की अनदेखी से उन्हें गिरिराज सिंह जैसे नेता से हार का मुंह देखना पड़ा. कन्हैया को समझ में आ गया कि बिहार में सीपीआई में रहकर संसदीय जीवन की शुरुआत नहीं हो सकती. एक तरफ जहांं कन्हैया के खिलाफ गिरिराज सिंह ताल ठोक रहे थे, वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव ने आरजेडी का उम्मीदवार उतारकर मुश्किलें और बढ़ा दी थीं. नतीजा उनको हार मिली. जानकार बताते हैं कि कन्हैया को पता चल गया था कि बिहार में राजनीति के लिए गठबंधन का मजबूत हिस्सा बनना जरूरी है.

Kanhaiya-Kumar

कांग्रेस को भी बिहार में सहारे की जरूरत

कन्हैया कुमार की सीपीआई से बढ़ रही दूरियों की मुख्य वजह कांग्रेस से नजदीकियां भी हैं. सूत्रों की माने तो कन्हैया ने कांग्रेस में शामिल होने का मन बना लिया है. कांग्रेस ने भी इस बात को खुलकर स्वागत किया है. कांग्रेस के कन्हैया को शामिल करने के पीछे बड़ी रणनीति मानी जा रही है. कांग्रेस का बिहार में कोई बड़ा युवा चेहरा ऐसा नहीं है जो विरोधियों पर खुलकर बरसे और अपना पक्ष रखे. प्रदेश अध्यक्ष से लेकर तमाम नेता वरिष्ठ हो चुके हैं, ऐसे में कन्हैया को पार्टी में शामिल कर कांग्रेस नया संदेश देना चाहती है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल भी समाप्त है और लगातार प्रदेश अध्यक्ष बदलने की चर्चा है. कांग्रेस मानती है कि कन्हैया जैसे युवा चेहरे के जरिये बिहार में रफ्तार बढ़ाई जा सकती है.

कन्हैया के जरिये आरजेडी पर कांग्रेस बढ़ाएगी दबाव

कांग्रेस पार्टी बिहार में अब तक आरजेडी की बैसाखियों पर ही चलने को मजबूर है. जब भी चुनाव आता है तो सीट बंटवारे में आरजेडी के दबाव में रहना पड़ता है. कई बार सीटों के चयन को लेकर नाराजगी सामने आई है. कांग्रेस का आधा खेमा अकेले चुनाव में जाने की बात भी करता रहा है. कन्हैया को अगर कांग्रेस अपनी पार्टी में शामिल करती है तो कन्हैया को तेजस्वी के सामने उतारकर हित साध सकती है. तेजस्वी और कन्हैया दोनों को हमेशा आमने-सामने देखा जाता रहा है. पार्टी में अनदेखी, कांग्रेस द्वारा मिल रहे ऑफर और राजनीतिक महत्वाकांक्षा में कन्हैया CPI से लगातार दूर होते चले गए हैं.

Source : News18

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