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रामनवमी: जिस चरित्र से पूरा मानव समाज गरिमा के साथ प्रकट होता है, वही राम हैं

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राम के बारे में ठीक ही कहा गया है कि राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है. मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बारे में इतना साहित्य रचा गया है कि शायद ही किसी नायक के इतने चरित्र गढ़े गए हों. भारत के उत्तर-दक्षिण-पूर्व और पश्चिम के देशों में भी राम कथा किसी न किसी रूप में मौजूद है. पश्चिमोत्तर में कांधार देश (आज का सेंट्रल एशिया) तो पूर्व में बर्मा, स्याम, थाईलैंड और इंडोनेशिया तक राम कथा के स्रोत मिलते हैं. राम भले वैष्णव हिन्दुओं  के लिए विष्णु के अवतार हों, लेकिन जैन, सिख और बौद्ध धर्मों में भी राम-कथा है.

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राम को हर जगह अयोध्या का राजा बताया गया है, बस बाकी चरित्रों में भिन्नता है. राम आदर्श, धीरोदात्त नायक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, उनके अन्दर सागर जैसी गम्भीरता है और उनके चरित्र में पहाड़ सदृश ऊंचाई. वे समाज में एक ऐसे चरित्र को प्रतिस्थापित करते हैं, जिस चरित्र से पूरा मानव समाज गरिमा के साथ प्रकट होता है. उनमें अनुशासन है, वे मां-बाप और गुरु के आज्ञाकारी हैं. लोभ तो उनमें छू तक नहीं गया है. ऐसे राम हमारे भारतीय समाज के नायक तो होंगे ही. तभी तो मशहूर शायर इकबाल ने भी उन्हें इमाम-ए-हिन्द बताया है.

रामकथा एक, वर्णन अनेक

राम एक ऐसे नायक हैं, जो धर्म, जाति और संकीर्णता के दायरे से मुक्त हैं. वे सिर्फ और सिर्फ मानवीय आदर्श के मानवीकृत रूप हैं. आदि कवि वाल्मीकि से लेकर मध्यकालीन कवि तुलसी तक ने उन्हें विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया है. लेकिन एक आदर्श नायक के सारे स्वरूप उनमें निहित हैं. हर कवि ने राम को अपनी नज़र से देखा और उनके अलौकिक गुणों की व्याख्या अपनी संवेदना से की. मूल आधार वाल्मीकि रामायण है, लेकिन क्षेपक अलग-अलग हैं. जैसे तमिल के महान कवि कंबन ने अपने अंदाज़ में गाया है तो असम के माधव कन्दली का अंदाज़ अलग है. उन्होंने 14वीं शताब्दी में सप्तकांड रामायण लिखी थी. लेकिन वहां लोकप्रिय हुई कृतिवास की बांग्ला में लिखी गई रामायण. कहीं राम स्वर्ण-मृग की खोज में नहीं जाते हैं तो कहीं वे सीता की अग्नि परीक्षा और सीता वनवास से विरत रहते हैं. जितने कवि उतने ही अंदाज़, किन्तु राम कथा एक. यह विविधता ही राम कथा को और मनोहारी तथा राम के चरित्र को और उदात्त बनाती है.

किष्किन्धा में अकेले पड़े राम लक्ष्मण

एक प्रसंग का वर्णन कंबन की तमिल राम कथा के सहारे और तुलसी का आधार लेकर सुप्रसिद्ध साहित्यकार रांगेय राघव ने किया है. वानर राज बालि के वध का प्रसंग तो अद्भुत है. वे लिखते हैं- बालि घायल पड़ा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि सुग्रीव उसका छोटा भाई कभी उसे परास्त भी कर सकता है. तभी उसने अर्ध चेतन अवस्था में ही राम और लक्ष्मण को वृक्षों के झुरमुट से बाहर आते देखा. वह फौरन समझ गया कि उसकी यह हालत सुग्रीव की गदा से नहीं बल्कि इन दो मनुष्यों के तीरों से हुई है. उसने कातर दृष्टि सांवले राम की तरफ डाली और बोला-

धर्म हेतु अवतरेहु गुसाईं, मारेहु मोहि ब्याधि की नाईं!

मैं बैरी सुग्रीव पियारा, कारन कवन नाथ मोहिं मारा!!

राम निरुत्तर थे. क्या बोलते. दूसरे का देश और वह प्रजा जो राम से अपरिचित थी. यहां सिर्फ हनुमान, अंगद और सुग्रीव के अलावा बाकी सब राम को नहीं जानते थे. वह समझ नहीं पा रहे थे कि क्या जवाब दे. अगर अपने राजा की यह स्थिति देखकर प्रजा भड़क गई तो, अथवा पट्ट महारानी तारा के विलाप से उनका पुत्र अंगद और देवर सुग्रीव विचलित हो गए तो राम का अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ मारा जाना तय था. भीड़ पर अंकुश पाना आसान नहीं होता. तारा की दहाड़ और अंगद का बिलखना खुद राम को भी विचलित कर रहा था. बड़ी कसमकश की घड़ी थी. तब ही अचानक राम की चेतना जागी और वे बोले-

अनुज वधू, भगिनी, सुत-नारी, सुन सठ कन्या सम ये चारी!

इन्हें कुदृष्टि बिलोकहि जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई!!

राम ने अपनी बुद्घि चातुर्य का अद्भुत प्रदर्शन किया. उन्होंने बड़ी सफाई से एक क्षण में ही बालि के संपूर्ण आचरण को संदेहास्पद बना दिया. अब बालि अपराध बोध से ग्रसित था. और उसकी प्रजा के पास इसका कोई जवाब नहीं था कि वह बालि के आचरण को सही कैसे ठहराए. यह सच था कि वानर राज बालि ने अपने छोटे भाई को लात मारकर महल से निकाल दिया था और उसकी पत्नी को अपने महल में दाखिल करवा लिया था. भले यह किष्किंधा राज्य वानरों का था पर दूसरे वह भी छोटे भाई की पत्नी को छीन लेना उचित कहां से था. राम ने एक मर्यादा रखी कि छोटे भाई की पत्नी, बहन और पुत्रवधू अपनी स्वयं की कन्या के समान है. और इन चारों पर बुरी नजर रखने वाले को मौत के घाट उतारना गलत नहीं है.

देश को हड़पना राम की नीति नहीं थी

तत्क्षण दृश्य बदल गया और बालि को अपने अपराध का भान होते ही वह स्वयं ही अपराध बोध से ग्रस्त हो गया और अपनी इस भूल का अहसास उसे हुआ तथा उसने प्राण त्याग दिए. राम ने एक मिनट की भी देरी नहीं की और सुग्रीव को किष्किंधा का नया राजा घोषित कर दिया तथा देवी तारा को दुख न हो इसलिए उनके पुत्र अंगद को युवराज.


इससे जनता में एक संदेश गया कि ये दोनों मनुष्य भले ही हमारे राजा के हंता हों पर ये राज्य के भूखे नहीं हैं और देखो इन्होंने राज्य खुद न हड़प कर हमारे राजा के छोटे भाई सुग्रीव को सौंपा तथा राजा बालि के पुत्र अंगद को युवराज बनाया. राम चाहते तो राजा विहीन किष्किंधा को हड़प सकते थे. क्योंकि सुग्रीव तो अपने भाई के साथ विश्वासघात करने के कारण वैसे ही अपराध के बोध से परेशान होते और विरोध भी न कर पाते. मगर राम ने एक मर्यादा को स्थापित किया.


यही राम की विशेषता थी जिसके कारण आज भी राम हमारे रोम-रोम में समा गए हैं. राम के बिना क्या हिंदू माइथोलॉजी, हिंदू समझदारी और हिंदू समाज व संस्कृति की कल्पना की जा सकती है? राम इसीलिए तो पूज्य हैं, आराध्य हैं और समाज की मर्यादा को स्थापित करने वाले हैं. वे किष्किंधा का राज्य सुग्रीव को सौंपते हैं और लंका नरेश रावण का युद्घ में वध करने के बाद वहां का राज्य रावण के छोटे भाई विभीषण को.

लोभ से परे हैं राम

राम को राज्य का लोभ नहीं है. वे तो स्वयं अपना ही राज्य अपनी सौतेली मां के आदेश पर यूं त्याग देते हैं जैसे कोई थका-मांदा पथिक किसी वृक्ष के नीचे विश्राम करने के बाद आगे की यात्रा के लिए निकल पड़ता है- राजिवलोचन राम चले, तजि बाप को राजु बटाउ की नाईं. राम आदर्श हैं और वे हर समय समाज के समक्ष एक मर्यादा उपस्थित करते हैं.


राम एक पत्नीव्रती हैं पर पत्नी से उनका प्रेम अशरीर अधिक है बजाय प्रेम के स्थूल स्वरूप के. वे पत्नी को प्रेम भी करते हैं मगर समाज जब उनसे जवाब मांगता है तो वे पत्नी का त्याग भी करते हैं. उसी पत्नी के लिए जिसे पाने हेतु वे उस समय के सबसे शक्तिशाली राजा रावण का वध करते हैं और उसकी विशाल सेना का नाश करते हैं.


मगर पत्नी के प्रति मोह से वे दूर हैं और अयोध्या के एक सामान्य-से व्यक्ति के आक्षेप पर वे सीता को पुनः वनवास पर भेज देते हैं. उसी सीता को जिसने उस समय अपने पति का साथ दिया जब राम को 14 साल के वनवास का आदेश मिला पर जब सीता को जंगल में भेजते हैं तो सीता अकेली हैं और गर्भवती हैं. सोचिए कैसा रहा होगा वह व्यक्ति जो समाज में मर्यादा बनाए रखने के लिए अपने प्यार, मोह और निष्ठा सब का त्याग करता है. राम के इसी आचरण को सुनकर लगता है कि राम मनुष्य नहीं भगवान ही रहे होंगे.

विविधता में एकता लाते हैं राम

राम हमारे मिथ के सबसे बड़े प्रतीक हैं. वे वैष्णव हैं, साक्षात विष्णु के अवतार हैं. वे उस समय की पाबंदी तोड़ते हुए खुद शिव की आराधना करते हैं और रामेश्वरम लिंगम की पूजा के लिए उस समय के सबसे बड़े शैव विद्वान दशानन रावण को आमंत्रित करते हैं. उन्हें पता है कि उनकी शिव अर्चना बिना दशानन रावण को पुरोहित बनाए पूरी नहीं होगी इसलिए राम रावण को बुलाते हैं. रावण आता है और राम को लंका युद्ध जीतने का आशिर्वाद देता है.

राम द्वेष नहीं चाहते. वे सबके प्रति उदार हैं यहां तक कि उस सौतेली मां के प्रति भी जो उनके राज्याभिषेक की पूर्व संध्या पर ही उन्हें 14 साल के वनवास पर भेज देती है और अयोध्या की गद्दी अपने पुत्र भरत के लिए आरक्षित कर लेती है. लेकिन राम अपनी इस मां कैकेयी के प्रति जरा भी निष्ठुर नहीं होते और खुद भरत को कहते हैं कि भरत माता कैकेयी को कड़वी बात न कहना. राम के विविध चरित्र हैं और वे सारे चरित्र कहीं न कहीं मर्यादा को स्थापित करने वाले हैं. संस्कृतियों के बीच समरसता लाने वाले हैं और विविधता में एकता लाने वाले हैं.

शरणागत की रक्षा

विभीषण राम की शरण में आए हैं, मंथन चल रहा है कि इन पर भरोसा किया जाए या नहीं. सुग्रीव भी तय नहीं कर पा रहे हैं न जामवंत. कई वानर वीर तो विभीषण को साथ लेने के घोर विरोधी हैं, उनका कहना है कि राक्षसों को कोई भरोसा नहीं. क्या पता रावण ने कोई भेदिया भेजा हो. राम को विभीषण की बातों से सच्चाई तो झलकती है, लेकिन राम अपनी ही राय थोपना नहीं चाहते.


वे चुप बैठे सब को सुन रहे हैं. सिर्फ बालि का पुत्र अंगद ही इस राय का है कि विभीषण पर भरोसा किया जाए. तब राम ने हनुमान की ओर देखा. हनुमान अत्यंत विनम्र स्वर में बोले- प्रभु आप हमसे क्यों अभिप्राय मांगते हैं? स्वयं गुरु वृहस्पति भी आपसे अधिक समझदार नहीं हो सकते. लेकिन मेरा मानना है कि विभीषण को अपने पक्ष में शामिल करने में कोई डर नहीं है. क्योंकि यदि वह हमारा अहित करना चाहता तो छिपकर आता, इस प्रकार खुल्लमखुल्ला न आता.


हमारे मित्र कहते हैं कि शत्रु पक्ष से जो इस प्रकार अचानक हमारे पास आता है, उस पर भरोसा कैसे किया जाए! किन्तु यदि कोई अपने भाई के दुर्गुणों को देखकर उसे चाहना छोड़ दे तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है. आपकी महिमा से विभीषण प्रभावित हो, तो इसमें आश्चर्य कैसा! परिस्थितियों को देखते हुए मुझे विभीषण पर किसी प्रकार की शंका नहीं होती. अब राम चाहते तो विभीषण के बारे में अपना फैसला सुना देते, लेकिन उन्होंने अपने समस्त सहयोगियों की राय ली. यही उनकी महानता है और सबकी राय को ग्रहण करने की क्षमता. वे वानर वीरों को भी अपने बराबर का सम्मान देते हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

Source : TV9

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छठ महापर्व में पंडितों की आवश्यकता क्यों नहीं होती है?

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चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरुआत शुक्रवार (28 अक्टूबर) से शुरू हो गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और नेपाल के कुछ हिस्सों सहित यह पर्व देश के हर उस हिस्से में मनाया जाता है, जहां पूर्वांचल के लोग रहते हैं। दिल्ली और मुंबई में भी इसके विहंगम दृश्य देखने को मिलते हैं। विदेशों की बात करें तो एरिज़ोना, रैले, पोर्टलैंड, मेलबर्न, दुबई और अबू धाबी जैसे विदेश के शहरों में भी पूर्वांचल के लोग छठ मनाते हैं।

पूजा के दौरान चार दिनों में क्या-क्या होता है, यह आप जानते ही होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छठ पूजा में पंडितों की भागीदारी की आवश्यकता क्यों नहीं होती है? आइए आपको इसके बारे में बाताते हें।

छठ के दौरान सूर्य की पूजा की जाती है। सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना जाता है। यहां मनुष्य और ईश्वर के बीच संवाद प्रत्यक्ष है। यहां किसी मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं होती है। छठ के दौरान सूर्य को अर्घ्य देते हुए व्रती स्वयं मंत्रों का जाप करते हैं। छठ के दौरान उगते और डूबते दोनों ही सूर्य की पूजा की जाती है। छठ से ही पता चलता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों महत्वपूर्ण हैं। इस लिहाज से छठ विशुद्ध धार्मिक होने के बजाय एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक त्योहार है।

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छठ में पुजारियों की मदद ली जा सकती है, वे प्रतिबंधित नहीं हैं। लेकिन अधिकतर व्रती स्वयं ही छठ के दौरान सूर्य देव, उनकी पत्नी उषा या छठी मैया, प्रकृति, जल और वायु की पूजा करते हैं।

यह महापर्व प्रकृति में तत्वों के संरक्षण का संदेश देती है। पूजा के लिए जलाशयों की सफाई एक महत्वपूर्ण पर्यावरण अनुकूल गतिविधि है। यह भी माना जाता है कि मानव शरीर सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान सकारात्मक सौर ऊर्जा को सुरक्षित रूप से अवशोषित कर सकता है। विज्ञान कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय किरणों में पराबैंगनी विकिरण सबसे कम होता है।

इस पर्व में शुद्धता का अत्यधिक महत्व है। भक्तों को पवित्र स्नान करने और संयम की आवश्यकता होती है। त्योहार के चार दिन वे फर्श पर सोते हैं। छठ समानता और बंधुत्व को बढ़ावा देता है। प्रत्येक भक्त अपने वर्ग या जाति की परवाह किए बिना समान प्रसाद तैयार करते हैं। छठ महापर्व में मुसलमान भी शामिल होते हैं।

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क्यों मनाते हैं छठ महापर्व?

छठ पूजा का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद ग्रंथों के कुछ मंत्रों का जाप उपासकों द्वारा सूर्य की पूजा करते समय किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि वैदिक युग के ऋषि स्वयं को सीधे सूर्य के प्रकाश में उजागर करके पूजा करते थे। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो उन्होंने और उनकी पत्नी सीता ने सूर्य देवता के सम्मान में व्रत रखा और डूबते सूर्य के अर्घ्य के साथ ही इसे तोड़ा।

दूसरी ओर, सूर्य देव और कुंती के पुत्र कर्ण को पानी में खड़े होकर प्रार्थना करने के लिए कहा गया था। कर्ण ने अंग देश पर शासन किया जो बिहार में आधुनिक भागलपुर है। माना जाता है कि द्रौपदी और पांडवों ने भी अपना राज्य वापस पाने के लिए छठ पूजा की थी।

Source : Hindustan

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‘जय छठी मईया’ : रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं त्योहार के फल और पकवान

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नहाय-खाय से लोक आस्था का महापर्व छठ की शुरुआत आज शुक्रवार से हो रही है। प्रारंभ से लेकर सुबह के अर्घ्य यानी समापन तक इस व्रत में प्रयुक्त होने वाली सामग्री का आयुर्वेद और स्वास्थ्य कारणों से भी बड़ा महत्व है। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. सुशील कुमार झा, डॉ. मधुरेंदु पांडेय और डॉ. धनंजय शर्मा ने बताया कि पहले दिन कद्दू-भात से लेकर छठ के ठेकुआ तक में कई ऐसे तत्व मिलते हें जो स्वास्थ्यवर्द्धक साबित हो सकते हैं। बताया कि नहाय-खाय के दिन व्रती महिला-पुरुष कद्दू (लौकी) भात खाते हैं।

कद्दू कद्दू पूरी तरह से सात्विक है। इसमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने की क्षमता होती है। साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अगर देखें तो कद्दू आसानी से पच भी जाता है आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखे तो यह गुरु, रुचिकर, हृदय के लिए हितकारी तथा धातुओं को पुष्ट करते है।

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चना दाल चने में प्रोटीन 17.1 प्रतिशत, कार्बेाहाइड्रेट 61.2 प्रतिशत और 5.3 प्रतिशत खनिज, विटामिन ए, बी 1 पाया जाता है।

गागर नींबू में विटामिन सी अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त विटामिन बी 1, कॅरोटीन तथा साइट्रिक अम्ल आदि द्रव्य पाये जाते हैं। रस में न्यूमोनिया रोधी तत्व एवं तृणाणुनाशक तत्व होते हैं। छिलके में सुगंधी तेल एवं तिक्त द्रव्य होता है। गुण और प्रयोग यह अम्ल, वात, कफ नाशक, दीपन, पाचन एवं तृष्णा निवारक है।

● नारियल- ताजा 100 ग्राम नारियल में आर्द्रता 36.3 प्रतिशत होती है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, तेल, फाइबर, कैल्शियम, फॉस्फोरस और विटामिन सी और आयरन-कॉपर पाए जाते हैं। नारियल मधुर, वृंहण वस्य शीत एवं वस्तिशोधक (मूत्र ब्लैडर की शुद्धि करता) है।

● सिंघाड़ा- स्वादिष्ट तथा कषायरसयुक्त, शीतल, गुरु, वृश्य (वीर्यवर्धक), ग्राही, शुक्र, वास तथा कफजनक व पित्त, रक्तविकार और दाह को दूर करने वाला होता है। इसमें मैगनीज तथा स्टार्च होता है। गुण व प्रयोग यह शीत, पौष्टिक, वृष्य, शोणितास्थापन ग्राही, दीपन, इसकी पेया अतिसार एवं प्रदर में दी जाती है। पित्त प्रकृति वालों को तथा गर्मिणी को इससे लाभ होता है।

● केला- पके केले का फल बल बढ़ाने वाला, रक्तपित्त शामक, संग्राहक तथा जीवनीय है। इससे शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ती है, आन्त्र की क्रिया सुधरती है तथा रक्त की अम्लता कम होती है।

● सेब- इसका फल मधुर, शीत, ग्राही, शुक्रल, वृंहण, कफकर, एवं वातपित्तहर होते हैं। यह हृदय, मस्तिष्क, यकृत एवं आमाशय को शक्ति देनेवाला है। रक्तातिसार तथा आमातिसार में सेब का मूरना देते हैं। विबंध में भी इसका उपयोग होता है।

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● ईख- तृष्णा, दाह, मूर्च्छा, पित्त तथा रक्तविकार को दूर वाला, गुरु, मधुर रसयुक्त, बलकारक, स्निग्ध, वातनाशक, सारक, वीर्यवर्धक, मोह को दूर करने वाले, शीतल, वृहण (रस रक्तादिवर्धक) तथा विषनाशक होता है।

● अदरक- अदरक से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। यह दर्द में राहत दिलाने में कारगार है। इससे माहवारी के दौरान होने वाली परेशानी में भी राहत मिलती है। रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और सांस संबंधी बीमारियों में असरकारक होता है।

● कच्ची हल्दी- कच्ची हल्दी के सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ती है। सर्दी-जुकाम की समस्या से भी छुटकारा मिलता है। कच्ची हल्दी बालों के विकास में भी फायदेमंद होती है। हल्दी में एंटी बैक्टीरियल, एंटीफंगल, एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट तत्व मौजूद होते हैं।

● अरवा चावल बलवर्धक है। कार्बोहाइड्रेट शरीर की क्षमता बढ़ाने में मददगार। पाचन क्रिया बेहतर बनाता है। अरवा चावल पेट के लिए भी ठीक होता है।

● ठेकुआ- गेहूं रक्त को साफ करता है, वजन घटाता है, पाचन को मजबूत करता है। हृदय रोग, हाई बीपी, उच्च रक्तचाप और थायराइड में गेहूं फायदेमंद होता है। गुड़ के साथ मिलकर यह शक्तिवर्धन का काम करता है।

● सूथनी- भूख को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। जिन लोगों को खाना खाने के बाद भी भूख लगती है, उन्हें डाइट में सुथनी को शामिल करने की सलाह दी जाती है। सुथनी विटामिन बी का अच्छा स्रोत है। पेट के अल्सर में सुथनी का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है। पेप्टिक अल्सर के उपचार में हर्बल दवाइयों के उपयोग पर हुए एक शोध में बताया गया है कि सुथनी में एंटी बैक्टीरियल और एंटी माइक्रोबियल गुण मौजूद होते हैं, जो पेट के अल्सर में फायदेमंद साबित होता है।

Source : Hindustan

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शारदीय नवरात्रि में जपें दुर्गा सप्तशती के ये प्रभावशाली मंत्र, मिलेगा धन, सौभाग्य और सफलता

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शारदीय नवरात्रि मां दुर्गा की पूजा करने और उनके मंत्रों के जाप से अपने कार्यों की सिद्धि करने का उत्तम अवसर है. इन नौ दिनों में आप मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करके अपनी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं. इसके लिए आपको दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का जाप करना चाहिए. दुर्गा सप्तशती में कई ऐसे प्रभावशाली सिद्ध मंत्र दिए गए हैं, जिनके जाप से आप उत्तम सेहत, धन, सौभाग्य, सुरक्षा, सफलता आदि की प्राप्ति कर सकते हैं.

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काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट बताते हैं कि दुर्गा सप्तशती के कई मंत्रों का जाप यदि शुद्धता के साथ करें और नियमों का पालन करें तो आपको अवश्य ही मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होगा. जिस पर मां दुर्गा की कृपा हो जाती है, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव जैसा नहीं रह जाता है क्योंकि मां दुर्गा आदिशक्ति हैं. आइए जानते हैं दुर्गा सप्तशती के उन चमत्कारी मंत्रों के बारे में, जो विशेष कार्यों के लिए ही सिद्ध किए जाते हैं.

दुर्गा सप्तशती के प्रभावशाली और चमत्कारी मंत्र

1. संकट और विपत्ति नाश करने वाला मंत्र
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।

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2. जीवन में सभी प्रकार के कल्याण का मंत्र
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तु ते।।

3. असाध्य रोगों के नाश के लिए मंत्र
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।

4. उत्तम सेहत और सौभाग्य के लिए मंत्र
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।

5. मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त करने के लिए मंत्र
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः।।

6. प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए मंत्र
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव।।

7. शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए मंत्र
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोस्तु ते।।

8. मां दुर्गा से रक्षा पाने के लिए मंत्र
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नरू पाहि चापज्यानिरूस्वनेन च।।

मां दुर्गा के अन्य प्रभावशाली मंत्र

9. दरिद्रता दूर करने के लिए मंत्र
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो।
सवर्स्धः स्मृता मतिमतीव शुभाम् ददासि।।

10. धन और संतान प्राप्ति के लिए मंत्र
सर्वाबाधा वि निर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥

11. सुख, सौभाग्य, सेहत के लिए मंत्र
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै।।

Source : News18

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