इमरजेंसी के संघर्ष से निकले रघुवंश बाबू ने कभी नहीं किया विचारों से समझौता
इमरजेंसी में पलायन की बजाय सीतामढ़ी के करीब 22 गुप्त अड्डों पर रहकर डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह वैचारिक आंदोलन चलाते रहे। सीतामढ़ी के पूर्व सांसद प्रो. महंथ श्यामसुन्दर दास का शीतलपट्टी मठ उनका प्रमुख अड्डा था। सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में प्राध्यापन के दौरान जय प्रकाश आंदोलन में कूदे। गांव-गांव में डेरा डालकर आम लोगों के बीच बैठकें करते, बौद्धिक खुराक (पम्फलेट-पत्र) बांटते और युवाओं को संगठित करते थे। वे दो बार जनकपुर की गुप्त बैठक में शामिल होने के लिए नेपाल गए, जिसमें कर्पूरी ठाकुर भी शामिल थे। जयप्रकाश आंदोलन के संघर्ष की आग में तपकर डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह फौलाद बन गए थे। आपातकाल के बाद 1977 में बेलसंड से जनता पार्टी के विधायक निर्वाचित हुए। मुख्यमंत्री के चयन में सत्येंद्र नारायण सिंह के बजाय कर्पूरी ठाकुर का साथ दिया। लोहिया, जयप्रकाश और कर्पूरी की धारा के अग्रदूत बन चुके रघुवंश बाबू ने कभी विचारों से समझौता नहीं किया। वे स्पष्टवादी थे। नीतीश कुमार हों या लालू प्रसाद, असहमति प्रकट करने व अपनी बातें रखने में उन्हें कभी हिचक नहीं हुई। दोनों के नाम उनके पत्र सुर्खियों में रहे।

मुश्किल था पुलिस का ‘द्वारिकापुरी’ पहुंचना
आंदोलनकारियों के बीच ‘द्वारिकापुरी’ एवं ‘कन्हैयापुरी’ जैसे सांकेतिक नामों से मशहूर शीतलपट्टी मठ तक पुलिस का पहुंचना मुश्किल था। मठ तक पहुंचने के लिए नाव से बागमती नदी पार करना पड़ता था। नदी किनारे पुलिस के पहुंचते ही मठ तक खबर पहुंच जाती थी। पुलिस समझ नहीं पाती थी कि सीतामढ़ी में ‘द्वारिकापुरी’ है। तत्कालीन जिला छात्र संघर्ष समिति की संचालन समिति के सदस्य ब्रजेश शर्मा बताते हैं कि चंदौली हाई स्कूल से मठ में एक टाइपराइटर की व्यवस्था की गई थी। वहां एक साइक्लोस्टाइल मशीन रखी गई थी। राष्ट्रीय नेताओं के पत्र-पैम्फलेट की प्रतियां जारी करने तथा आंदोलन के मुद्दों को छापकर गांव-गांव में पहुंचाने की जवाबदेही रघुवंश बाबू की थी। महंथ डॉ. राजीव रंजन दास बताते हैं कि रघुवंश बाबू ‘द्वारिकापुरी’ के प्रभारी थे।
पहचान नहीं पाई पुलिस
जाड़े की एक शाम रघुवंश बाबू मठ में बैठकर घूरा (आग) ताप रहे थे। अचानक पुलिस आ गई। पुलिस ने सवाल किया- प्रो. रघुवंश प्रसाद सिंह कहां हैं? रघुवंश बाबू ने तपाक से जवाब दिया- रउरा सब के आबे के खबर मिलते ओन्ने भाग गेलन। उनकी दाढ़ी बढ़ी थी। धोती पहने और चादर ओढ़कर बैठे थे। शाम के झुरमुट में पुलिस उन्हें पहचान नहीं पाई और उन्हीं द्वारा बताई गई दिशा में उन्हें ढूंढ़ने निकल गई। पुलिस के लौटते ही रघुवंश बाबू नौ दो ग्यारह हो गए।
कर्पूरी के बाद लालू के साथ
रघुवंश बाबू दल बदलने में विश्वास नहीं करते थे। कर्पूरी ठाकुर के साथ रहे। उन्हें पार्लियामेंट्री बोर्ड का सदस्य बनाया गया। उनके निधन के बाद लालू प्रसाद के साथ चले। राजद के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार ओझा बताते हैं कि रघुवंश बाबू अक्सर लालू के करीब आने की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते थे। उन दिनों बिहार में अनुपलाल यादव, विनायक प्रसाद यादव, गजेंद्र प्रसाद हिमांशु एवं मुंशीलाल राय जैसे कद्दावर नेताओं से लालू प्रसाद को चुनौती मिल रही थी। तब नीतीश कुमार ने बार-बार उनसे लालू प्रसाद का साथ देने का आग्रह किया था।
अक्खर और फक्कड़ थे रघुवंश बाबू
रघुवंश बाबू अपने राजनीतिक विचारों के प्रति अक्खर थे और उनकी जीवन शैली फक्कड़ थी। सामान्य गंवई अंदाज में रहते थे। गांव के लोगों और किसानों में बड़ी लोकप्रियता थी। लोग उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था तो करते ही थे, उन्हें खादी का कुर्ता-धोती भी खरीदकर देते थे। वैशाली से संसदीय राजनीति के दौरान वे बैंक अधिकारी गोपाल महतो के घर पर डेरा डालते थे। बाद के दिनों में वे विधान पार्षद दिनेश प्रसाद सिंह के आवास पर रहा करते थे।
Source : Bibhesh Trivedi – Deputy News Editor, Hindustan








