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हर सोमवार करें शिव पंचाक्षर स्तोत्रम पाठ, आप पर होगी शिव कृपा

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सावन का हर दिन शिव जी  की भक्ति के लिए अच्छा अवसर माना जाता है. वैसे में सावन सोमवार का दिन तो इसके लिए और भी उत्तम होता है. सावन में आप सच्चे मन से भगवान शिव का ध्यान करते हैं और उनके मंत्रों का जाप करते हैं, तो आपकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए बहुत से मंत्र और स्तोत्र हैं, जिनका जाप या पाठ करने से लाभ प्राप्त होता है, इनमें शिव पंचाक्षर स्तोत्रम भी शिव जी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उत्तम साधन है.

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काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट कहते हैं कि शिव पंचाक्षर स्तोत्रम में भगवान शिव की स्तुति गान है और उनके गुणों का वर्णन किया गया है. शिव पंचाक्षर स्तोत्रम में नम: शिवाय: बार बार आता है. जिन लोगों को शिव पंचाक्षर स्तोत्रम याद नहीं होता है, उनको पूजा के समय शिव पंचाक्षर मंत्र ओम नम: शिवाय का ही जाप कर लेना चाहिए. यह शिव जी का सबसे प्रभावशाली मंत्र है. इस मंत्र के जाप से सभी प्रकार के मनोकामनाओं की पूर्ति होती है. इस मंत्र को आप प्रत्येक दिन या फिर प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकते हैं.

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शिव पंचाक्षर स्तोत्रम पाठ की विधि

जिस दिन आपको शिव पंचाक्षर स्तोत्रम का पाठ करना हो, उस दिन सबसे पहले भगवान शिव की पूजा करें. शिव जी का गंगाजल से अभिषेक करें. उसके बाद उनको सफेद फूल, भांग, मदार फूल, बेलपत्र, धतूरा, शहद, गाय का दूध, शक्कर, अक्षत्, चंदन आदि अर्पित करें.

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फिर धूप, दीप, गंध आदि चढ़ाएं. उसके बाद से शिव पंचाक्षर स्तोत्रम का पाठ करें. इसका पाठ करते समय शब्दों का सही उच्चारण करना चाहिए. यदि संस्कृत शब्दों को पढ़ने में समस्या आती है, तो इसके हिंदी अर्थ को भी पढ़ सकते हैं.

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम

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नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:।।

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मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।

मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:।।

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शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।

श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:।।

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वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय।

चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै व काराय नम: शिवाय:।।

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यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय।

दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै य काराय नम: शिवाय:।।

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पंचाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेत शिव सन्निधौ।

शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

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नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे ‘न’ काराय नमः शिवायः।।

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ओम नम: शिवाय…हर हर महादेव…ओम नम: शिवाय!!!

Source : News18

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साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए खुलता है नागचंद्रेश्वर मंदिर, नेपाल से आई ये प्रतिमा बेहद खास

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सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है. तिथि के मुताबिक इस बार नाग पंचमी 2 अगस्त को पड़ रही है. नाग पंचमी के दिन स्त्रियां नाग देवता की पूजा करती हैं और सांपों को दूध पिलाया जाता है. सनातन धर्म में सर्प को पूज्यनीय माना गया है. नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा की जाती है और उन्हें गाय के दूध से स्नान कराया जाता है. माना जाता है कि जो लोग नाग पंचमी के दिन नाग देवता के साथ ही भगवान शिव की पूजा और रुद्राभिषेक करते हैं, उनके जीवन से कालसर्प दोष खत्म हो जाता है. साथ ही राहु और केतु की अशुभता भी दूर होती है.

साल में सिर्फ नाग पंचमी के दिन खुलते हैं इस मंदिर के कपाट, भक्त करते हैं  11वीं शताब्दी की अद्भुत प्रतिमा के दर्शन Nag Chandreshwar temple situated  is opened only in the

महाकाल की नगरी उज्जैन को मंदिरों का शहर कहा जाता है. इस शहर की हर गली में एक ना एक मंदिर जरूर है. उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर के तीसरे भाग में नागचंद्रेश्वर मंदिर है. नागचंद्रेश्वर मंदिर का अपना अलग महत्व है. इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के दिन 24 घंटे के लिए ही खुलते हैं. नागचंद्रेश्वर मंदिर की क्या खास बात है यह भी जान लेते हैं

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UJJAIN : दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर जो साल में सिर्फ नागपंचमी के दिन ही  खुलता है, यहां सर्प शैय्या पर विराजमान हैं महादेव.

नेपाल से लाई गई थी प्रतिमा

भगवान नागचंद्रेश्वर की मूर्ति काफी पुरानी है और इसे नेपाल से लाया गया था. नागचंद्रेश्वर मंदिर में जो अद्भुत प्रतिमा विराजमान है उसके बारे में कहा जाता है कि वह 11वीं शताब्दी की है. इस प्रतिमा में शिव-पार्वती अपने पूरे परिवार के साथ आसन पर बैठे हुए हैं और उनके ऊपर सांप फल फैलाकर बैठा हुआ है. बताया जाता है कि इस प्रतिमा को नेपाल से लाया गया था. उज्जैन के अलावा कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है. यह दुनिया भर का एकमात्र मंदिर है जिसमें भगवान शिव अपने परिवार के साथ सांपों की शय्या पर विराजमान हैं.

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त्रिकाल पूजा की है परंपरा

मान्याताओं के मुताबिक, भगवान नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा की परंपरा है. त्रिकाल पूजा का मतलब तीन अलग-अलग समय पर पूजा. पहली पूजा मध्यरात्रि में महानिर्वाणी होती है, दूसरी पूजा नागपंचमी के दिन दोपहर में शासन द्वारा की जाती है और तीसरी पूजा नागपंचमी की शाम को भगवान महाकाल की पूजा के बाद मंदिर समिति करती है. इसके बाद रात 12 बजे वापिस से एक साल के लिए बंद हो जाएंगे.

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पौराणिक कथा

मान्यताओं के मुताबिक, सांपों के राजा तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए तपस्या की थी जिससे भोलेनाथ प्रसन्न हुए और सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया. वरदान के बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया. लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही इच्छा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो.इसलिए यही प्रथा चलती आ रही है कि सिर्फ नागपंचमी के दिन ही उनके दर्शन होते हैं. बाकी समय परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है. दर्शन को उपलब्ध होते हैं. शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है.

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नाग पंचमी शुभ मुहूर्त 

नाग पञ्चमी मंगलवार, अगस्त 2, 2022 को

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पञ्चमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 02, 2022 को सुबह 05 बजकर 13 मिनट से शुरू

पञ्चमी तिथि समाप्त – अगस्त 03, 2022 को सुबह 05 बजकर 41 मिनट पर खत्म

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नाग पञ्चमी पूजा मूहूर्त – सुबह 06 बजकर 05 मिनट से 08 बजकर 41 मिनट तक

अवधि- 02 घण्टे 36 मिनट्स

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नाग पंचमी की पूजा-विधि 

नाग पंचमी के दिन अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट, शंख, कालिया और पिंगल नामक देव नागों की पूजा की जाती है. पूजा में हल्दी, रोली, चावल और फूल चढ़ाकर नागदेवता की पूजा करें. कच्चे दूध में घी और चीनी मिलाकर नाग देवता को अर्पित करें. इसके बाद नाग देवता की आरती उतारें और मन में नाग देवता का ध्यान करें. अंत में नाग पंचमी की कथा अवश्य सुनें.

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Source : Aaj Tak

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रक्षाबंधन पर भद्रा का साया… लेकिन आयुष्मान, साैभाग्य रवि और शाेभन योग का संयाेग इसका कम करेगा प्रभाव

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11 अगस्त को रक्षाबंधन पर्व पर इस बार अशुभ भद्रा योग का साया रहेगा। पूर्णिमा तिथि इस दिन सुबह 9:37 से शुरू होकर अगले दिन 12 अगस्त को सुबह 7:18 बजे तक रहेगी, लेकिन इसी दौरान भद्रा योग भी शुरू हो जाएगा, जो रात 8:27 बजे तक रहेगा। भद्राकाल में राखी बंधवाना शुभ नहीं माना जाता है। हालांकि पंचांगों में भद्राकाल के समय को लेकर मतभेद होने से संशय की स्थिति बनी हुई है। कुछ पंचांगों में भद्राकाल का समय गुरुवार दोपहर 2:38 तक ही है। पंडितों का कहना है कि भद्रा योग समाप्त होने पर राखी बंधवाएं और ज्यादा जरूरी हो तो प्रदोषकाल में शुभ, लाभ, अमृत में से कोई एक चौघड़िया देखकर राखी बंधवा लें। इस दिन यदि भद्रा का अशुभ योग है तो आयुष्मान, सौभाग्य, रवि, शोभन योग जैसे शुभ योगों का संयोग भी रहेगा। इस बार पाताल में भद्रा का निवास जब भद्रा निवास आकाश लोक में रहता है तो शुभ कार्य किए जा सकते हैं, लेकिन इस बार 11 अगस्त को निवास पाताल लोक में रहेगा।

शास्त्रोक्त मान्यता… सूर्य और छाया की पुत्री भद्रा शनि की बहन शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार सूर्य और छाया की पुत्री भद्रा शनि की बहन है। भद्रा को कुरूप और भक्षण प्रवृत्ति की मानी जाती है। वह जन्म के समय ही सृष्टि का विनाश करने पर उतारू थी। इसे ब्रह्मा ने शांत कर उसे 7वें करण में स्थान दिया। तब से इस योग में रक्षाबंधन और अन्य शुभ कर्म वर्जित माना जाता है।

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रक्षाबंधन पर इस बार चार योग

11 अगस्त को सूर्योदय से दोपहर 3:31 तक आयुष्मान योग रहेगा।

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सुबह 5:30 से शाम 6:53 तक रवि योग।

गुरुवार दोपहर 3:32 से शुक्रवार सुबह 11:33 तक सौभाग्य योग रहेगा।

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गुरुवार को रक्षाबंधन पर धनिष्ठा नक्षत्र के साथ शोभन योग भी बनेगा।

असमंजस… राखी बंधवाने के समय को लेकर पंडित एक मत नहीं

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पूर्णिमा पर श्रावणी उपाकर्म दसविधि स्नान आदि सुबह भद्रा शुरू होने से पहले करें। या फिर अगले दिन शुक्रवार को सूर्योदय के बाद से पूर्णिमा रहने यानी शुक्रवार को सुबह 7:18 बजे तक कर लें। भद्राकाल में राखी बंधवाने से बचें। यह अशुभ योग होता है। ज्यादा जरूरी होने पर प्रदोषकाल में शाम 6 से 7:30 के बीच राखी बंधवाएं। वैसे भद्रा का पुच्छकाल शाम 5:17 से शाम 6.18 तक रहेगा।

स्थानीय शिव पंचांग में भद्रा 11 अगस्त को दोपहर 2:38 तक ही है। इसके बाद राखी बंधवा सकते हैं। पूर्णिमा तिथि 12 अगस्त को सुबह 7:05 बजे तक ही है। इसलिए 11 अगस्त को ही रक्षाबंधन मनाया जाना उचित है। वैसे ज्यादातर पंचांगों में भद्रा गुरुवार रात 8:27 तक रहने का ही उल्लेख है। पंडितों के अनुसार राखी बंधवाने से पहले दीप जलाकर उसे साक्षी बनाए।

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Source : Dainik Bhaskar

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भगवान शिव को प्रिय श्रावण मास, उन्हें प्रसन्न करने के लिए होता है अभिषेक

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पौराणिक कथा के अनुसार सावन मास में ही समुद्र मंथन हुआ था इस मंथन से हलाहल विष निकला तो चारों तरफ हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने विष को कंठ में धारण कर लिया,विष की वजह से कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष का प्रभाव कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने भगवान शिव को जल अर्पित किया जिससे उन्हें राहत मिली। इससे वे प्रसन्न हुए तभी से हर साल सावन मास में भगवान शिव को जल अर्पित करने या उनका जलाभिषेक करने का रिवाज शुरू हो गया।

Mahashivratri 2021: Here's why Tulsi leaves are not offered on shivling when worshiping Lord Shiva | Books News – India TV

2. माता सती ने भगवान शंकर को पाने के लिए श्रावण के महीने में ही अत्यंत साधना की थीं, और प्रतिदिन बालू/ मिट्टी का शिवलिंग निर्माण कर के उस शिवलिंग का पूर्ण विधि पूर्वक से पूजा अर्चना करती थी,और पूजा करने के बाद शिवलिंग को जल में प्रवाहित कर देती थी।

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3. श्रावण माह में जब भगवान विष्णु चातूर मास के देवसोनी एकादशी को शेषनाग के सय्या पर सोने के लिए जाते है उस से पहले भंडारिया नवमी को शिव जी का आराधना कर के ९ बिल्वपत्र अर्पित कर लक्ष्मी जी के साथ शिव जी को पूरे श्रृष्टि का कार्यभार सौंप देते है ।

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4. बाल काल से ही माता पार्वती शिव जी को पाने के लिए अत्यंत साधना करती थीं । भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें श्रावण माह में ही दर्शन दिए थे,और वो पहली बार इसी मास में मिली थी ।

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5. श्रावण माह में ही भगवान शिव जी ने माता पार्वती जी को अमर कथा सुनाई / श्रवन कराई थी।

महाशिवपुराण में अन्य अन्य जातियों के लिए अन्य-अन्य मिट्टी का उल्लेख आता है, जिसे उपयोग में लाने से विशेष फल प्राप्त होता है।

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1. ब्राह्मण के लिए- लाल मिट्टी.

2. वैश्य के लिए – पीली मिट्टी.

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3. क्षत्रिय के लिए-लाल मिट्टी.

4. शुद्र के लिए- काली मिट्टी.

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Tribute to Lord Shiva

भगवान शिव की पूजा का लाभ

भगवान शिव की भक्ति और पूजा के लिए यह महीना सबसे उत्तम माना गया है. श्रावण मास में विधि-विधान से शिव साधना करने पर व्यक्ति के सभी प्रकार के संकट और बाधाएं दूर होती हैं और उसे जीवन से जुड़े से सभी सुखों की प्राप्ति होती है। देवों के देव महादेव की पूजा के बारे में मान्यता है कि जो कोई व्यक्ति सच्चे मन से उनकी साधना करता है, उसे जीवन में कभी किसी चीज का भय नहीं रहता है और वह शिव की कृपा से दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की करता है।

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1.जीवन में कई बार कुछ लोगों के जीवन में पग-पग में अड़चनें आती हैं और तमाम कोशिशों के बाद भी दूर नहीं होती हैं. यदि आपके साथ भी कुछ ऐसा है तो इस श्रावण मास भगवान शिव की साधना पूरे विधि-विधान से करें,ऐसा करने पर शिव कृपा से आपकी सफलता के मार्ग में आने वाली सभी बाधाएं शीघ्र ही दूर हो जाएंगी।

2. भगवान शिव की साधना शत्रुओं पर विजय दिलाने वाली मानी गई है,ऐसे में यदि आपको हर समय जाने-अनजाने शत्रुओं का खतरा बना रहता है तो आप श्रावण मास में प्रतिदिन विधि-विधान से शिव पूजन करें।

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3.भगवान शिव की साधना से संतान सुख की प्राप्ति होती है यदि आपकी यह कामना अभी अधूरी है तो स्वस्थ,सुंदर और गुणी संतान की प्राप्ति के लिए श्रावण में मार्कंडेय महादेव की साधना करें संतान प्राप्ति के लिए सावन के महीने में दूध में चंदन मिलाकर शिव की साधना का विधान है।

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4. भगवान शिव की साधना करने वाले पुरुष हो या फिर स्त्री जीवन में मनचाहा जीवनसाथी मिलता है यदि आपको अभी तक सच्चा जीवनसाथी नहीं मिल पाया है तो उसे पाने के लिए सावन के महीने में पड़ने वाले प्रदोष में विशेष रूप से पूजा करें।

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5. भगवान शिव को आरोग्य का देवता भी माना जाता है आरोग्य का सुख पाने के लिए उनके भक्त बाबा वैद्यनाथ की विशेष रूप से पूजा करते हैं मान्यता है कि सच्चे मन से शिव की साधना करने वाले भक्त को कभी किसी प्रकार का रोग-शोक नहीं सताता है और सुखी जीवन जीता है।

6. कहते हैं अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त महाकाल का भगवान शिव जिन्हें मृत्युंजय भी कहा जाता है, उनकी साधना करने वाले भक्त को कभी अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है।

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7. कल्याण के देवता माने जाने वाले भगवान शिव की साधना करने वाले भक्त को जीवन में कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं रहती है श्रावण मास में शिव की साधना करने पर आर्थिक दिक्कतें दूर होती हैं और शिव कृपा से घर धन-धान्य से भरा रहता है।

8. यदि आपको लगता है कि आपके भीतर जीवन से जुड़ी तमाम तरह परेशानियों का मुकाबला करने में दिक्कत होती है, या फिर कहीं आपको उनका सामना करने से डर लगता है तो अपने आत्मबल को बढ़ाने और उनसे पार पाने के लिए शिव साधना करें।

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9. यदि आपको लगता है कि आपके परिवार के प्रेम और सामंजस्य को किसी की बुरी नजर लग गई है,और हर समय छोटी-छोटी बातों को लेकर कलह होती रहती है तो उसे दूर करने और सुख-शांति को पाने के लिए शिव साधना सबसे उत्तम उपाय माना गया है। भगवान शिव को गृहस्थ जीवन का आदर्श माना जाता है, ऐसे में पारिवारिक सुख को पाने के लिए शिव की साधना जरूर करें।

Maha Shivratri 2022: Why does Lord Shiva apply 'bhasma' on his body? Know here

शिव की पूजा कैसे करें?

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सावन का महीना पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित होता है और इस दौरान जो भक्त पूरे श्रद्धा भाव से पूजा एवं जल और दूध का अभिषेक करता है,उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। ऐसा माना जाता है कि यदि कुंवारी कन्याएं सावन के महीने में विधि पूर्वक शिव पूजन करती हैं तो उन्हें जल्द ही अच्छे वर की प्राप्ति होती है,यहीं नहीं जो भक्त इस पूरे महीने भक्ति भाव से पूजन करता है उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

मान्यतानुसार सावन का महीना शिव उपासना के लिए सबसे श्रेष्ठ है और भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो भक्तों के पूजन से अति शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं,ऐसा माना जाता है कि वे बहुत भोले हैं इसलिए उन्हें भोले बाबा भी कहा जाता है। वैसे तो शिव की पूजा कभी भी की जा सकती है लेकिन सावन के पूरे महीने में शिव पूजन करने के लिए सोमवार का दिन श्रेष्ठ माना जाता है।

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सावन सोमवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जागें। इसके बाद पूरे घर की सफाई करके स्नानादि से निवृत्त हो जाएं,पूरे घर में गंगा जल या पवित्र नदी का जल छिड़कें। पूजा करते वक्त कभी भी काले वस्त्र धारण ना करें बल्कि सावन में मुख्य रूप से हरा, केसरिया, पीला, लाल और सफेद रंग के वस्त्र धारण करना लाभकारी माना जाता है।

इस दिन भगवान शंकर के साथ पार्वती जी की भी पुष्प, धूप, दीप और जल से पूजा करनी चाहिए,सोमवार को भगवान शिव के व्रत या पूजन के दिन महामृत्युंजय मंत्रका 108 बार जाप करना भी अति श्रेष्ठ माना जाता है। इस जप से सभी रोगों से मुक्ति मिलती है एवं मन को शांति मिलती है।

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इसके अलावा ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करना भी सावन सोमवार में लाभदायक होता है। इससे व्यक्ति का मानसिक तनाव दूर होता है। यदि आप व्रत करते हैं तो पूरे दिन फलाहार का सेवन करें और दिन में एक बार भोजन करें जिसमें अन्न और नमक का सेवन न करें।

आचार्य नितेश पाठक ‘सौरव’

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